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Thursday, December 01, 2011

मुस्कानों की निश्छल आभा : रावेंद्रकुमार रवि की बालकविता


मुस्कानों की निश्छल आभा


 इस दुनिया में मुझको
सबसे अच्छे लगते फूल !
इनके बीच बैठकर मैं
अपने दुख जाता भूल !


इनकी कोमल पंखुड़ियों पर
सदा ख़ुशी मुस्काती !
मुस्कानों की निश्छल आभा
मेरे मन को भाती !



इन्हें देख मधुकर की बोली
मधुरस से भर जाए !
मीठे-मीठे मधुर तराने
वह गुंजन कर गाए !


रवि की किरणें फूलों पर
अपना स्नेह लुटातीं !
और ख़ुशी के आलेखन से
इनको ख़ूब सजातीं !


रावेंद्रकुमार रवि

10 comments:

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

वाह क्या बात है! सुन्दर सुगन्धित कविता है रावेन्द्र जी.

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

बहुत सुंदर रचना .....

डॉ0 मानवी मौर्य ने कहा…

बढि़या कविता। फूल ऐसा विषय है जिस पर सम्‍भवत: सर्वाधिक कवितायें लिखी गई हैं।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

आपको फूल अच्छे लगते हैं।
हमें भी बहुत अच्छे लगते हैं।।
--
वैसे आजकल तो FOOL का ही जमाना है!

Kailash C Sharma ने कहा…

बहुत प्यारी कविता...

"रुनझुन" ने कहा…

फूलों की खुशबू लिए प्यारी सी कविता..

Ram Avtar Yadav ने कहा…

कविता अच्छी लगी

Saba Akbar ने कहा…

सुन्दर कविता !

purnima ने कहा…

its beautiful Ravi ji ...........

गिरिजा कुलश्रेष्ठ ने कहा…

फूलों के सौन्दर्य व सुरभि से रची-बसी प्यारी कविता । नववर्ष इसी तरह जीवन में सुरभि-सौन्दर्य लाए ।

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