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शुक्रवार, फ़रवरी 18, 2011

मीठे सपनों में खोई है : रावेंद्रकुमार रवि का नया बालगीत

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♥♥ मीठे सपनों में खोई है ♥♥
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बहुत सलोनी मेरी बहना, 
मीठे सपनों में खोई है! 

सरस हवा का झोंका आकर, 
लोरी इसे सुनाएगा जब! 
धीरे से हँसता इसका मुख, 
सबके मन को भाएगा तब! 
इसकी हँसी देख मन कहता, 
यह तो कभी नहीं रोई है! 

किसी महकते हुए फूल की, 
जब कुछ पंखुरियाँ बरसेंगी! 
इसके माथे पर सजधजकर, 
झिलमिलकर ख़ुशियाँ चमकेंगी!
इसे देखना, पर चुप रहना, 
माँ की गोदी में सोई है! 

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♥♥ रावेंद्रकुमार रवि ♥♥ 
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चित्रों में हैं : तन्वी, पाखी और उनके मम्मी-पापा
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बुधवार, फ़रवरी 16, 2011

तैराएँगे नइया : डॉ. मोहम्मद साजिद ख़ान का बालगीत

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तैराएँगे नइया
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छप-छप-छप-छप-छइया,
कर लो मेरे भइया!


पानी बरसे झर-झर,
मेढक बोलें टर-टर।
उछल-फिसल पानी में,
मस्त नाचती गइया।
छप-छप-छप-छप-छइया।


बिजली चमके चम-चम,
बादल गरजें थम-थम।
खिड़की के परदों से,
खेल रही पुरवइया।
छप-छप-छप-छप-छइया।


पेड़ सरसते हँसकर,
बहे पनारे झर-झर।
बगुला उड़ता जाए,
जैसे हो कनकइया।
छप-छप-छप-छप-छइया।


मौसम है यह प्यारा,
बहती है जलधारा।
खेलेंगे हम जमकर,
तैराएँगे नइया।
छप-छप-छप-छप-छइया।


डॉ. मोहम्मद साजिद ख़ान 
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(अंतिम चित्र में हैं : सरस पायस)
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सोमवार, फ़रवरी 14, 2011

महक मेरा मन फूला : रावेंद्रकुमार रवि का नया बालगीत



महक मेरा मन फूला


मुझे प्यार है फूलों से, ये 
मुझसे करते प्यार!
झुलाऊँ इनको झूला!
झुलाऊँ इनको झूला!


इन्हें देखकर उड़ जाते हैं 
दुख के सभी पपीहे!
महके-महके मिल जाते हैं 
ख़ुशियों के उपहार!
महक मेरा मन फूला!
झुलाऊँ इनको झूला! 


इन्हें देख होती तितली ख़ुश 
भौंरे गाते झूमें! 
हँसते-हँसते बन जाते ये 
मेरे मन के हार! 
बना मन मेरा दूल्हा! 
झुलाऊँ इनको झूला!


 रावेंद्रकुमार रवि  
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♥♥ चित्र में हैं : सरस पायस व उनकी जेब पर लगा फूल ♥♥ 
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शनिवार, फ़रवरी 12, 2011

पाखी की रंजनाओं के साथ रवि की शिशुकविताएँ

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जब "सरस पायस" के लिए
पाखी ने अपनी रंजनाएँ (पेंटिंग्स) भेजी थीं,
तब बहुत कोशिश करने पर भी मैं कुछ नहीं रच पाया था!
लेकिन इस बार की रंजनाएँ देखते ही
मेरा मन-मस्तिष्क खिल उठा और हर रंजना के लिए
एक-एक कविता मुस्कराने लगी!
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सुंदर-सा पालना बनाया
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आइसक्रीम सूँघकर मुर्गा,
बोला - "कैसे खाऊँगा?
गला ख़राब हो गया यदि तो,
कैसे बाँग लगाऊँगा?"
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सूरज निकला, फूल खिल गया,
बोला - "चिड़िया, गाओ!
जिद छोड़ो, तुम गुड़िया रानी,
तुम भी अब मुस्काओ!"
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अंतरिक्ष से उड़कर आए,
कुछ अजीब-से लोग!
उन्हें देखकर तन्वी नाची,
नाचे वे सब लोग!

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सुंदर-सा पालना बनाया,
झूल रही पाखी की बहना!
जैसे झूले मेरे घर पर,
झूम-झूमकर प्यारी नयना!
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चित्र : अक्षिता पाखी कविताएँ : रावेंद्रकुमार रवि
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