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शुक्रवार, जून 18, 2010

दादाजी की छड़ी : संगीता स्वरूप का नया शिशुगीत


दादाजी की छड़ी : संगीता स्वरूप

कोने में रहती है खड़ी,
मेरे दादाजी की छड़ी।

सुबह सैर को जाते हैं जब,
इसे साथ ले जाते हैं।
देख-देखकर इसको बच्चे,
डर-डरकर घबराते हैं।
मैं जब भी करता शैतानी,
लगता मेरे सिर पर पड़ी।
मेरे दादाजी की ... ... .

आमबाग में जाते हैं जब,
वे बच्चा बन जाते हैं।
तोड़-तोड़कर आम छड़ी से,
मुझको ख़ूब खिलाते हैं।
फिर भी मेरी नज़रें हरदम,
आमों पर रहती हैं गड़ी।
मेरे दादाजी की ... ... .

शनिवार, अप्रैल 03, 2010

बोलो, मेरी गुड़िया रानी : संगीता स्वरूप का नया शिशुगीत

बोलो, मेरी गुड़िया रानी!
क्यों करती हो तुम मनमानी?
बोलो, मेरी गुड़िया रानी!

बिस्किट, टॉफी, केक, मिठाई,
बोलो, क्या तुमको मन-भाई?

चीज़ कौन-सी तुमको खानी?
बोलो, मेरी गुड़िया रानी!

शरबत, कोकाकोला लाऊँ,
या फिर जलजीरा बनवाऊँ?
लोगी, क्या तुम नींबू-पानी?
बोलो, मेरी गुड़िया रानी!

जल्दी कुछ खाने को ले लो,
संग साथियों के फिर खेलो!
क्यों गुस्सा होने की ठानी?
बोलो, मेरी गुड़िया रानी!

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संगीता स्वरूप
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( चित्र में हैं : कशिश )

गुरुवार, मार्च 04, 2010

ख़ूब रसीला : संगीता स्वरूप की एक शिशु कविता

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ख़ूब रसीला
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गोल-गोल है लाल टमाटर,
सबके मन को भाता
है
स्वाद बढ़ाता सब्जी का,
जब
उसमें डाला जाता है ।

खट्टा -मीठा, ख़ूब रसीला,
मन होता खाते जाएँ ।
रंगत लाल टमाटर-जैसी,
अपने
गालों पर पाएँ
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संगीता स्वरूप
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बुधवार, फ़रवरी 24, 2010

सेब निराला : संगीता स्वरूप की एक शिशु कविता

सेब निराला
लाल-लाल है सेब निराला,
ख़ुश होता हर खानेवाला ।
जो है इसको प्रतिदिन खाता,
वह रोगों को दूर भगाता ।




संगीता स्वरूप

शुक्रवार, फ़रवरी 05, 2010

मानसिकता : संगीता स्वरूप की एक लघुकथा


मानसिकता

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संगीता स्वरूप

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"माँ ! मैं कक्षा में प्रथम आई हूँ !" -  बिटिया ख़ुशी से चिल्लाती हुई घर में घुसी । 

माँ ने कहा - "अव्वल आई है तो क्या ? पराये घर जाकर चूल्हा ही तो झोंकना है तुझे । इतना चिल्ला क्यों रही है ?" 

माँ की बात बेटी के दिल को लग गई । उसने ठान लिया कि वो चूल्हा तो नही झोंकेगी । 

वक्त गुज़रा । 

आज वो भारतीय प्रशासनिक सेवा में है । माँ गर्व से बताती है कि उसकी बेटी सरकारी अफसर है । 

एक दिन पड़ोसन ने पूछ लिया - "बेटी को घर का काम भी आता है ? खाना बना लेती है ?" 

माँ ने अकड़कर कहा -"मेरी बेटी बहुत बड़ी सरकारी अफसर है ! वो चूल्हा क्यों झोंकेगी ?" 

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