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बुधवार, दिसंबर 14, 2011

भौंरे जी : रावेंद्रकुमार रवि का बालगीत


भौंरे जी !



भौंरे जी, मुस्काते जी ! 
कली देख रुक जाते जी ! 
चूस-चासकर मधुरस उसका 
अपने घर को जाते जी !

भौंरे जी, मुस्काते जी !
मधुरिम गीत सुनाते जी !
पंख पसारे फूल-फूल पर
गुन-गुनकर मँडराते जी !

भौंरे जी, मुस्काते जी !
फूलों से बतियाते जी !
चूम-चूम सुंदर मुख उनका
अपना मन हर्षाते जी !

भौंरे जी, मुस्काते जी !
चिड़िया से डर जाते जी !
ढूँढ-ढाँढकर कली अधखिली
झट उसमें छुप जाते जी ! 


रावेंद्रकुमार रवि 

शुक्रवार, अक्टूबर 21, 2011

ऐसे, ऐसे, ऐसे ... ... ... : रावेंद्रकुमार रवि का बालगीत


ऐसे, ऐसे, ऐसे ... ... ...


दीवाली पर दीप जले कुछ ऐसे, ऐसे, ऐसे ... ... ...
मम्मी की गोदी में छोटा भइया पलता जैसे!

दीवाली पर हँसी फुलझड़ी ऐसे, ऐसे, ऐसे ... ... ...
पापा के काले चश्मे में सूरज चमके जैसे!

दीवाली पर बम छूटे कुछ ऐसे, ऐसे, ऐसे ... ... ...
मन में मीठी बूँदीवाले लड्डू फूटें जैसे!

दीवाली पर रॉकेट भागा ऐसे, ऐसे, ऐसे ... ... ...
बिल्ली से डर मोटा-मोटा चूहा भागे जैसे!

दीवाली पर खिली खील कुछ ऐसे, ऐसे, ऐसे ... ... ...
दिल में ख़ुशबूवाला फूल ख़ुशी का फूले जैसे!

दीवाली पर मची गुदगुदी ऐसे, ऐसे, ऐसे ... ... ...
लहर सरसती उठ-उठ गिर-गिर किसी नदी में जैसे!

दीवाली पर महक उड़ी कुछ ऐसे, ऐसे, ऐसे ... ... ...
छुट्टी हो तो दौड़ लगाकर बच्चे भागें जैसे!

दीवाली पर चकई नाची ऐसे, ऐसे, ऐसे ... ... ...
गुटरूँगूँकर चक्कर काट कबूतर नाचे जैसे!



रावेंद्रकुमार रवि

रविवार, जुलाई 24, 2011

इंद्रधनुष कितना अनूप है : डॉ. रूपचंद्र शास्त्री मयंक का बालगीत

इंद्रधनुष कितना अनूप है

शीतल पवन चली सुखदाई,
रिमझिम-रिमझिम बरखा आई। 


भीग रहे हैं पेड़ों के तन,
भीग रहे हैं आँगन-उपवन।
हरियाली है ख़ूब नहाई।
रिमझिम-रिमझिम बरखा आई। 


मेढक टर्र-टर्र चिल्लाते,
झींगुर हैं मस्ती में गाते।
अब फुहार सबके मन भाई।
रिमझिम-रिमझिम बरखा आई। 


आसमान में बिजली कड़की,
डर से सहमे लड़का-लड़की।
बंदर की तो शामत आई।
रिमझिम-रिमझिम बरखा आई। 


कहीं छाँव है, कहीं धूप है,
इंद्रधनुष कितना अनूप है।
धरती ने है प्यास बुझाई।
रिमझिम-रिमझिम बरखा आई। 

डॉ. रूपचंद्र शास्त्री मयंक

गुरुवार, जून 30, 2011

मेघ बजे : बाबा नागार्जुन का एक लोकप्रिय बालगीत



मेघ बजे



धिन-धिन-धा धमक-धमक, मेघ बजे।
दामिनि यह गई दमक, मेघ बजे।


दादुर का कंठ खुला, मेघ बजे।
धरती का हृदय धुला, मेघ बजे।
धिन-धिन-धा धमक-धमक, मेघ बजे।


पंक बना हरिचंदन, मेघ बजे।
हल का है अभिनंदन, मेघ बजे।
धिन-धिन-धा धमक-धमक, मेघ बजे।


♣ नागार्जुन ♣

(यह गीत उत्तराखंड में कक्षा - सात की हिंदी की पाठ्य-पुस्तक में शामिल है।)

(सभी चित्र : गूगल खोज से साभार)

शुक्रवार, मई 27, 2011

कमल खिल रहा : रावेंद्रकुमार रवि का नया बालगीत

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अँधेरा घिरने लगा था!
आज हम फिर उसी पार्क में गए!
कमल-कुंज के पास पहुँचे,
तो हमारा मन ख़ुशियों से भरकर खिल उठा!
मेढकों के साथ-साथ दो खिलते हुए कमल
हमारा स्वागत कर रहे थे!
हम दोनों उनकी सुंदरता आपने साथ ले आए!
आप भी देखिए और ख़ुश होकर गुनगुनाइए यह गीत! 
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कमल खिल रहा 
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कमल खिल रहा, कमल खिल रहा! 
कमल खिल रहा हँसता-गाता! 


इसकी मधु-मुस्कान देखकर, 
मन ख़ुशियों से भर-भर जाता! 
कमल खिल रहा हँसता-गाता! 


ज्यों-ज्यों बढ़ती रात सुहानी, 
इसका रूप निखरता जाता!
कमल खिल रहा हँसता-गाता! 


धवल चाँदनी इसे हँसाती, 
चंदा इसको गीत सुनाता!
कमल खिल रहा हँसता-गाता! 

 

इसके साथ खेलता मेढक, 
खेल-खेल में वह भी गाता! 
कमल खिल रहा हँसता-गाता! 


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रावेंद्रकुमार रवि 
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बुधवार, मई 25, 2011

टर्र-टर्र-टूँ-टर-टर-टर : रावेंद्रकुमार रवि का नया बालगीत


आजकल "सरस पायस" की छुट्टियाँ चल रही हैं!
वह मेरे साथ है! 
कल हम एक पार्क में घूमने गए! 
वहाँ बने कमल-कुंज में हमें एक मेढक मिला! 
उसने मुझसे ख़ूब प्यारे-प्यारे फ़ोटो खिंचवाए! 
फिर मैंने उसे पकड़ा, तो वह चूहे-जैसा अभिनय करने लगा! 
सरस पायस ने उसकी इस अदा को भी कैमरे में क़ैद कर लिय़ा! 
आज इन चित्रों को पुन: देखा, तो यह गीत रच गया! 
आप सब  भी इसे पढ़कर आनंद लीजिए!


टर्र-टर्र-टूँ-टर-टर-टर


कमल-कुंज के पत्तों में से
झाँक रहा मेढक हँसकर!


देख रहा है टुकुर-टुकुर यह
कब बरसेगा पानी?
कब आएगी लड्डू लेकर
इसकी प्यारी नानी?
नानी से यह बात करेगा -
टर्र-टर्र-टूँ-टर-टर-टर!


तबला बजा-बजा पत्तों का
छप-छप करके गाएगा!
फिसल-फिसलकर, तैर-तैरकर
मस्ती से भर जाएगा!
उछल-उछलकर दौड़ेगा, जब
पानी बरसेगा झर-झर!


रावेंद्रकुमार रवि

शनिवार, मई 21, 2011

बढ़िया बहुत पसीना : रावेंद्रकुमार रवि का एक बालगीत


बढ़िया बहुत पसीना 

गरमी के मौसम में लगता, 
बढ़िया बहुत पसीना! 

जब शरीर का ताप बढ़े यह, 
निकल-निकलकर आए! 
धीरे-धीरे भाप बने, फिर 
शीतलता पहुँचाए! 

यह ना आए, तो हो जाए 
मुश्किल सबका जीना! 
गरमी के ... ... . 

रोमछिद्र में भरी गंदगी, 
यह बाहर ले आए! 
सदा त्वचा की रक्षा करता, 
त्वचा न फटने पाए! 

इसको छूकर गरम हवा भी, 
ठंडी हो जाए ना! 
गरमी के ... ... . 

अगर पसीना ना आए तो, 
त्वचा सूख जाती है! 
चढ़ती है दिमाग पर गरमी, 
रह-रह तड़पाती है! 

इसे बुलाने की ख़ातिर तुम, 
गट-गट पानी पीना! 
गरमी के ... ... .

सोमवार, मई 09, 2011

बस थोड़ा-सा पढ़ने दो : डॉ. मोहम्मद अरशद ख़ान का बालगीत

बस थोड़ा-सा पढ़ने दो


जो ना जानें लिखना-पढ़ना,
उन सबको अब क़लम पकड़कर,
नई सीढ़ियाँ चढ़ने दो।
बस, थोड़ा-सा पढ़ने दो। 


जो ना पढ़ पाए हैं पुस्तक,
जिन्हें नहीं है अक्षर-ज्ञान,
खेल न पाए खेल-खिलौने,
रूठी है जिनसे मुस्कान।
जिन हाथों में जूठे बर्तन,
उनको स्लेट पकड़ने दो।
बस, थोड़ा-सा पढ़ने दो।


जिन्हें न मिलता प्यार अनूठा,
जिन्हें न करते सभी दुलार,
जिनको क़िस्मत में मिलती है,
पग-पग पर कड़वी फटकार।
अब उनको भी अवसर देकर,
अपनी क़िस्मत गढ़ने दो।
बस, थोड़ा-सा पढ़ने दो।


ना जाने इनमें ही कोई,
छुपा हुआ हो मोती-लाल,
जो अपनी भारत माता का
ऊँचा कर सकता है भाल।
इनको इस अनंत अंबर में,
पंख खोलकर उड़ने दो।
बस, थोड़ा-सा पढ़ने दो।


डॉ. मोहम्मद अरशद ख़ान 
(सभी चित्र : गूगल खोज से साभार)

रविवार, मार्च 06, 2011

फूट पड़ी चेहरों पर लाली : डॉ. मोहम्मद अरशद ख़ान का गीत

फूट पड़ी चेहरों पर लाली 

बैठ पालकी मेरी गुड़िया,
आज चली ससुराल।


छम-छम करती काढ़े घूँघट,
गहनों से कर ख़ूब सजावट,
चोटी में मोती से सजकर,
गुँथे हुए हैं बाल।

सुंदर है माथे का टीका,
नथ के आगे चंदा फीका,
चमके चम-चम चुनरी प्यारी,
और गरारा लाल। 


गुड्डा आया चढ़कर घोड़ा,
शरमाकर उसने मुख मोड़ा,
मन ही मन में हँसता-गाता,
फुला-फुलाकर गाल।

बजती है धुन बहुत निराली,
फूट पड़ी चेहरों पर लाली,
ठुमक-ठुमककर नाच दिखाते,
दे-देकर सब ताल। 


डॉ. मोहम्मद अरशद ख़ान

बुधवार, मार्च 02, 2011

मन-मंदिर में रहते हैं वे : रावेंद्रकुमार रवि का नया बालगीत

मन-मंदिर में रहते हैं वे 


भोले बाबा ने भोली-सी 
बात कही है कानों में! 
वे बसते हैं नन्हे-मुन्ने 
बच्चों की मुस्कानों में! 


अँखियाँ बंद करें हम तो, वे 
अँखियों में बस जाते हैं! 
डमरू बजा-बजाकर हमको
बढ़िया नाच दिखाते हैं! 
इसीलिए अच्छे लगते हैं 
हमको वे भगवानों में! 


गन्ने की मीठी पोई का 
रस वे हमें चखाते हैं! 
झरबेरी के बेर खिलाकर 
मीठा गीत सुनाते हैं! 
मन-मंदिर में रहते हैं वे 
रहते नहीं मकानों में! 

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रावेंद्रकुमार रवि 
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♥♥ क्रम से चित्रों में हैं ♥♥
नयना, तन्वी, पाखी, 
जायन्हा (अंतरा), सरस पायस, लविज़ा, 
प्रियांशु, आन्या, डुगडुग, 
आदित्य, सोनमन, माधव!
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शुक्रवार, फ़रवरी 18, 2011

मीठे सपनों में खोई है : रावेंद्रकुमार रवि का नया बालगीत

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♥♥ मीठे सपनों में खोई है ♥♥
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बहुत सलोनी मेरी बहना, 
मीठे सपनों में खोई है! 

सरस हवा का झोंका आकर, 
लोरी इसे सुनाएगा जब! 
धीरे से हँसता इसका मुख, 
सबके मन को भाएगा तब! 
इसकी हँसी देख मन कहता, 
यह तो कभी नहीं रोई है! 

किसी महकते हुए फूल की, 
जब कुछ पंखुरियाँ बरसेंगी! 
इसके माथे पर सजधजकर, 
झिलमिलकर ख़ुशियाँ चमकेंगी!
इसे देखना, पर चुप रहना, 
माँ की गोदी में सोई है! 

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♥♥ रावेंद्रकुमार रवि ♥♥ 
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चित्रों में हैं : तन्वी, पाखी और उनके मम्मी-पापा
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बुधवार, फ़रवरी 16, 2011

तैराएँगे नइया : डॉ. मोहम्मद साजिद ख़ान का बालगीत

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तैराएँगे नइया
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छप-छप-छप-छप-छइया,
कर लो मेरे भइया!


पानी बरसे झर-झर,
मेढक बोलें टर-टर।
उछल-फिसल पानी में,
मस्त नाचती गइया।
छप-छप-छप-छप-छइया।


बिजली चमके चम-चम,
बादल गरजें थम-थम।
खिड़की के परदों से,
खेल रही पुरवइया।
छप-छप-छप-छप-छइया।


पेड़ सरसते हँसकर,
बहे पनारे झर-झर।
बगुला उड़ता जाए,
जैसे हो कनकइया।
छप-छप-छप-छप-छइया।


मौसम है यह प्यारा,
बहती है जलधारा।
खेलेंगे हम जमकर,
तैराएँगे नइया।
छप-छप-छप-छप-छइया।


डॉ. मोहम्मद साजिद ख़ान 
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(अंतिम चित्र में हैं : सरस पायस)
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