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शनिवार, जनवरी 09, 2010

रंग-रँगीली : कृष्णकुमार यादव की एक बालकविता

रंग-रँगीली

चिड़िया रानी चूँ-चूँ करके
सबको सुबह जगाती है!
रंग-रँगीली चहक-चहककर
सबका मन हर्षाती है!


आँगन में बिखरे दानों को
फुदक-फुदककर खाती है!
अगर पकड़ने दौड़ो उसको
झट से वह उड़ जाती है!


जितना भी दौड़ें हम बच्चे,
उतना हमें छकाती है!
फुर्र-फुर्रकर आसमान में
कलाबाजियाँ खाती है!

कृष्णकुमार यादव

7 comments:


संगीता पुरी ने कहा…
बहुत प्‍यारा बालगीत लिखा है ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…
सुबह-सुबह ही चिड़िया रानी, आंगन में आ जाती है। इधर-उधर बिखरे चावल के, दाने सब खा जाती है। फुर्र से उड़ जाती यह, जब हम करते कुछ मक्कारी। चिड़िया रानी, मुझको और, भैया को लगती है प्यारी।

JHAROKHA ने कहा…
आँगन में बिखरे दानों को फुदक-फुदककर खाती है! अगर पकड़ने दौड़ो उसको झट से वह उड़ जाती है! रावेन्द्र जी , बहुत अच्छा बालगीत है कृष्ण कुमार जी का ..उन्हें मेरी बधाई पहुंचाएं.

अरविंद राज ने कहा…
chidiya hamesha se hi bachchoo ke liye aakarshan ka kendra rahi hai. Iski sundar baton ki sundar prastuti hui hai Saras Payas Par. Achcha Laga!

अरविंद राज ने कहा…
chidiya hamesha se bachchon aur kaviyon ke beech vartalaap ka ek shaahakt madhyam rahi hai. Is kadi mein prastut balgeet ek bahut hi SARAS prayas hai. Badhai

डॉ. देशबंधु शाहजहाँपुरी ने कहा…
जितनी सुन्दर चिडिया रानी !उससे सुन्दर उसकी कहानी !! बधाई यादव जी !

irdgird ने कहा…
कविता पढ़कर बचपन और चिडि़या याद आई। पहले घर में चिडि़या और उसके घोंसले दिखाई पड़ते थे लेकिन अब चहचहाट सुननी हो तो आबादी से कहीं दूर जाना पड़ता है। कंक्रीट के जंगलों में अब उनके बसेरे कहां।

8 टिप्‍पणियां:

shikha varshney ने कहा…

बेहद खुबसूरत बालगीत है

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

सुन्दर बालगीत है जी!
आप इसे मेरी टिप्पणी समझें
यदि उचित समझें तो-
आगामी किसी दिन के लिए पोस्ट समझकर प्रकाशित कर दें-

चिड़िया रानी फुदक-फुदक कर,

मीठा राग सुनाती हो।

आनन-फानन में उड़ करके,

आसमान तक जाती हो।।


मेरे अगर पंख होते तो,

मैं भी नभ तक हो आता।

पेड़ो के ऊपर जा करके,

ताजे-मीठे फल खाता।।


जब मन करता मैं उड़ कर के,

नानी जी के घर जाता।

आसमान में कलाबाजियाँ कर के,

सबको दिखलाता।।


सूरज उगने से पहले तुम,

नित्य-प्रति उठ जाती हो।

चीं-चीं, चूँ-चूँ वाले स्वर से ,

मुझको रोज जगाती हो।।


तुम मुझको सन्देशा देती,

रोज सवेरे उठा करो।

अपनी पुस्तक को ले करके,

पढ़ने में नित जुटा करो।।


चिड़िया रानी बड़ी सयानी,

कितनी मेहनत करती हो।

एक-एक दाना बीन-बीन कर,

पेट हमेशा भरती हो।।


अपने कामों से मेहनत का,

पथ हमको दिखलाती हो।।

जीवन श्रम के लिए बना है,

सीख यही सिखलाती हो।

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

अवश्य शास्त्री जी,
अभी तो यादव जी की यह कविता प्रकाशित हो गई है!
आपकी कविता तुरंत प्रकाशित करने में मज़ा नहीं आएगा!
इसे बाद में किसी विशेष अवसर पर "सरस पायस" पर अवश्य सजाया जाएगा!
अनमोल टिप्पणी व सुंदर कविता के लिए आभारी हूँ!
संपादक : "सरस पायस"

Sambhav ने कहा…

सुंदर गीत. मजा आ गया.

http://esambhav.blogspot.com/

http://bm.samwaad.com/ पर मेरी कबिता देख खुली कमरे की खिड़की, चुपके से घुस आती है पढ़े।

ज्योति सिंह ने कहा…

bahut hi masoom si aur pyari rachna ,jise padh bachpan yaad aa gaya

बेनामी ने कहा…

bahut bahut hi sundar rachna hai.
MAHIMA KUMARI

Ram Shiv Murti Yadav ने कहा…

Behatrin...yadon ko sajati kavita.

अक्षिता (पाखी) ने कहा…

कित्ता प्यारा गीत है..मजा आ गया पढ़कर.

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