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शनिवार, दिसंबर 24, 2011

तोतेजी : अनिल रस्तोगी की एक शिशुकविता

तोतेजी


दिन-भर टें-टें-टें-टें करते,
हरे परों के तोतेजी!
खा जाते हैं ढेरों मिर्चे,
ज़रा न रोते तोते जी!

अनिल रस्तोगी
(एक फूल, जो असमय ही मुरझा गया!)
(पुण्य तिथि : 24.12.1986)

बुधवार, दिसंबर 14, 2011

भौंरे जी : रावेंद्रकुमार रवि का बालगीत


भौंरे जी !



भौंरे जी, मुस्काते जी ! 
कली देख रुक जाते जी ! 
चूस-चासकर मधुरस उसका 
अपने घर को जाते जी !

भौंरे जी, मुस्काते जी !
मधुरिम गीत सुनाते जी !
पंख पसारे फूल-फूल पर
गुन-गुनकर मँडराते जी !

भौंरे जी, मुस्काते जी !
फूलों से बतियाते जी !
चूम-चूम सुंदर मुख उनका
अपना मन हर्षाते जी !

भौंरे जी, मुस्काते जी !
चिड़िया से डर जाते जी !
ढूँढ-ढाँढकर कली अधखिली
झट उसमें छुप जाते जी ! 


रावेंद्रकुमार रवि 

सोमवार, नवंबर 07, 2011

रावेंद्रकुमार रवि की बालकहानी : सुंदर कौन?

सुंदर कौन ?

सोनाली और रूपाली जुड़वाँ बहनें हैं। सब प्यार से उन्हें सोना-रूपा कहकर पुकारते हैं। दोनों ही पढ़ने में बहुत तेज़ हैं और लगभग हर काम में आगे रहती हैं। अपने नामों की ही तरह वे दोनों सुंदर भी बहुत हैं।

वे एक-दूसरे को बहुत चाहती हैं। हमेशा हिल-मिलकर रहती हैं। यदि कभी-कभार किसी बात पर झगड़ा हो भी जाता है, तो जल्दी ही मेल भी हो जाता है। वे एक-दूसरे के बिना रह ही नहीं पाती हैं।

एक बार की बात है - दोनों बहनों ने एक साथ बैठकर फ़ोटो खिंचवाया। जब फ़ोटो बनकर आया, तो वे दोनों उसे देखने लगीं।

देखते-देखते सोना बोल पड़ी - ‘‘तेरा फ़ोटो अच्छा नहीं आया !’’

‘‘क्यों ? क्या कमी है इसमें ?’’ - झट से रूपा ने भी पूछ लिया।

‘‘ख़ुद ही देख, तेरी आँखें कैसी मिची जा रही हैं !’’ - सोना ने थोड़ा-सा मुँह बनाते हुए कहा।

इस पर रूपा और ज़्यादा मुँह टेढ़ा करके बोली - ‘‘तो तेरा फ़ोटो कौन-सा अच्छा आया है ? देख, अपनी नाक तो देख। कैसी पकौड़े की तरह फूली जा रही है !’’

‘‘चल-चल ! मेरा फ़ोटो ज़्यादा सुंदर है !’’ - सोना ने चिढ़कर कहा, तो रूपा ने फ़ोटो उसके हाथ से छीनकर उसे धक्का दे दिया।

इसके बाद काट खाने जैसे अंदाज़ में सोना से बोली - ‘‘हट ! मेरा फ़ोटो ज़्यादा सुंदर है !’’

एकदम बात इतनी बढ़ गई कि हाथापाई तक की नौबत आ गई। यदि माँ बीच में न आ जातीं, तो शायद लड़ाई हो ही जाती।

फ़ोटो की तो धज्जियाँ उड़ गईं। उसके टुकड़े कमरे में इधर-उधर बिखर गए। सोना-रूपा में बोलचाल बंद हो गई।

ऐसा पहली बार हुआ था। ख़ुद उन दोनों की समझ में नहीं आ रहा था कि वे दोनों आपस में इतनी बुरी तरह लड़ने के लिए कैसे तैयार हो गईं !

माँ ने सोचा कि अभी फिर मिलकर खेलने लगेंगी। ऐसा तो हमेशा होता है। लेकिन जब शाम तक वे दोनों एक-दूसरे से नहीं बोलीं, तो माँ को बहुत हैरानी हुई। शाम को उन्होंने उनके पापा को सारी बात बताई।

पहले तो पापा कुछ देर सोचते रहे। फिर उन्होंने दोनों को अपने पास बुलाया और बोले - ‘‘जाइए, अपनी-अपनी कॉपी-पेंसिल लेकर आइए। हम फ़ैसला करेंगे कि आप दोनों में से कौन ज़्यादा सुंदर है !’’

जब दोनों कॉपी-पेंसिल ले आईं, तो उन्होंने बोलना शुरू किया। वे दोनों लिखने लगीं --

(1) एक फूल का पौधा और उसके नीचे बैठा एक ख़रगोश का बच्चा बनाना है।
(2) गणित में अभ्यास पाँच का तीसरा और छठा प्रश्न हल करना है।
(3) सामान्य ज्ञान के पाँच प्रश्नों के उत्तर बताने हैं।
(4) एक पृष्ठ का इमला लिखना है।
(5) याद की हुई एक कविता सुनानी है।

यह सब लिखवाने के बाद पापा ने कहा - ‘‘पहले आप लोग शुरू के दो प्रश्न हल कीजिए। उसके बाद मैं सामान्य ज्ञान के प्रश्न पूछूँगा, इमला बोलूँगा और फिर आप लोग मुझे कविता सुनाएँगी।’’

हल जाँचने के बाद पापा ने बताया - ‘‘फूल का पौधा तो सोना ने बहुत सुंदर बनाया है, लेकिन ख़रगोश का बच्चा रूपा का ज़्यादा अच्छा बना है। गणित के प्रश्न दोनों ने सही हल किए हैं।’’

सामान्य ज्ञान में शुरू के तीन प्रश्नों के उत्तर सोना ने सही बताए और बीच के तीन रूपा ने। यानि कि दोनों ने तीन-तीन प्रश्नों के उत्तर सही बताए।

फिर उन्होंने इमला बोला। सोना की पाँच और रूपा की सात ग़लतियाँ आईं। कविता रूपा ने फटाफट सुना दी, पर सोना अंत में थोड़ा-सा अटक गई।

अब पापा ने उनसे पूछा - ‘‘बताइए, आप दोनों में से कौन ज़्यादा होशियार है ?’’

‘‘ ... ... ’’ - दोनों ने नज़रें झुका लीं।

‘‘अरे भइ, उत्तर दीजिए !’’ - पापा ने फिर कहा।

लेकिन उन्हें कोई उत्तर सूझ ही नहीं रहा था। माँ धीरे-धीरे मुस्कुरा रही थीं।

पापा ने दोनों के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा - ‘‘अब तो आप दोनों समझ ही गई होंगी कि बुद्धि और गुण के आगे सुंदरता कुछ भी नहीं है। जो व्यक्ति गुणवान और बुद्धिमान होता है, वह अच्छा होता है।

‘‘सुंदरता भी अच्छी होती है। लेकिन तब, जब अच्छे-अच्छे गुणों की ख़ुशबू उसके साथ हो !

‘‘और फिर आप तो दोनों ही सुंदर हैं और होशियार भी। बिल्कुल ग़ुलाब के फूलों की तरह ! फिर कैसी लड़ाई और कैसा झगड़ा ?’’ - यह कहते-कहते उन्होंने दोनों के गालों पर एक-एक पप्पी जड़ दी।

वे दोनों एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराने लगीं। एक-दूसरे से बोलने को बेचैन तो थीं ही। जल्दी ही फिर चहचहाने लगीं - ‘‘मम्माँ ! हमको भूख लगी है, जल्दी हमको खाना दो। चूहे पेट में कूद रहे हैं, जल्दी हमको खाना दो।’’

-- ♥♥ रावेंद्रकुमार रवि ♥♥ --

सबसे पहले यह कहानी इस रूप में छपी थी!

गुरुवार, नवंबर 03, 2011

जलेबी की मिठास-जैसा : यदि ऐसा हो जाए (कविता-संकलन)

यह है एक कविता-संकलन का मुखपृष्ठ!


और यह है इस संकलन के पीछे छपा फ़ोटो!


इस फ़ोटो में मुस्कुरा रहे हैं - सृजन 
और गुस्सा होने का अभिनय कर रही हैं - सृष्टि! 

इस संकलन में शामिल सभी कविताएँ 
इन दोनों के पापा ने रची हैं! 
सभी कविताओं के साथ चित्र भी हैं, 
पर अंदर के पृष्ठों पर रंगों का अभाव है!

वैसे तो इस संकलन में विभिन्न विषयों पर 
50 से अधिक कविताएँ शामिल हैं!
पर एक गीत मुझे बहुत अच्छा लगा! 
आप सब भी गाकर देखिए! 
बहुत मज़ा आएगा!

मुझे जलेबी दो

गरम-गरम रसदार करारी, मुझे जलेबी दो।
ओ अम्मा! झट प्यारी-प्यारी मुझे जलेबी दो।

सर्दी है अब इसका जलवा
सबको भाया है।
हलवाई ने अभी-अभी ही
इसे बनाया है।
चाय, पराँठे, मूँगफली,
हलवा की चाह नहीं।
काजू मेवे खाकर भी
मन बोले वाह नहीं।
अरे! टिफिन में ढेरों-सारी मुझे जलेबी दो।।
ओ अम्मा! झट प्यारी-प्यारी मुझे जलेबी दो।

जितनी खा पाऊँगा,
उतनी ही मैं खाऊँगा,
और बचेंगी जितनी,
उनको वापस लाऊँगा।
उन्हें साँझ को भिगो दूध में,
देना तुम अम्मा।
बड़े चाव से खाऊँगा मैं
करता यम-यम्मा।
होगी मुझ पर कृपा तुम्हारी, मुझे जलेबी दो। 
ओ अम्मा! झट प्यारी-प्यारी मुझे जलेबी दो।


और ये रहे जलेबी की मिठास-जैसी कविताएँ रचनेवाले 
सृष्टि और सृजन के पापा!


डॉ. नागेश पांडेय संजय

शुक्रवार, अक्तूबर 21, 2011

ऐसे, ऐसे, ऐसे ... ... ... : रावेंद्रकुमार रवि का बालगीत


ऐसे, ऐसे, ऐसे ... ... ...


दीवाली पर दीप जले कुछ ऐसे, ऐसे, ऐसे ... ... ...
मम्मी की गोदी में छोटा भइया पलता जैसे!

दीवाली पर हँसी फुलझड़ी ऐसे, ऐसे, ऐसे ... ... ...
पापा के काले चश्मे में सूरज चमके जैसे!

दीवाली पर बम छूटे कुछ ऐसे, ऐसे, ऐसे ... ... ...
मन में मीठी बूँदीवाले लड्डू फूटें जैसे!

दीवाली पर रॉकेट भागा ऐसे, ऐसे, ऐसे ... ... ...
बिल्ली से डर मोटा-मोटा चूहा भागे जैसे!

दीवाली पर खिली खील कुछ ऐसे, ऐसे, ऐसे ... ... ...
दिल में ख़ुशबूवाला फूल ख़ुशी का फूले जैसे!

दीवाली पर मची गुदगुदी ऐसे, ऐसे, ऐसे ... ... ...
लहर सरसती उठ-उठ गिर-गिर किसी नदी में जैसे!

दीवाली पर महक उड़ी कुछ ऐसे, ऐसे, ऐसे ... ... ...
छुट्टी हो तो दौड़ लगाकर बच्चे भागें जैसे!

दीवाली पर चकई नाची ऐसे, ऐसे, ऐसे ... ... ...
गुटरूँगूँकर चक्कर काट कबूतर नाचे जैसे!



रावेंद्रकुमार रवि

सोमवार, अक्तूबर 10, 2011

सो जा मेरे मन के हार : रावेंद्रकुमार रवि की पहली लोरी

सो जा मेरे मन के हार

मन में पड़ने लगी फुहार,
सो जा मेरे मन के हार!


चंदा ने निंदिया भिजवाई,
ख़ुशबू भरकर प्यार!
सो जा मेरे मन के हार!


मस्त हवा के झोंके आकर
तुझको करें दुलार!
सो जा मेरे मन के हार!


सपनों की दुनिया में तुझको
ख़ुशियाँ रहीं पुकार!
सो जा मेरे मन के हार!


मेरी बाहों का झूला भी
तुझे रहा पुचकार!
सो जा मेरे मन के हार!


मेरी आँखों की नदिया में
झूम रही पतवार!
सो जा मेरे मन के हार!

रावेंद्रकुमार रवि

(मेरे साथ सोनमन के छायाकार : सरस पायस)

सृजन : 30.03.2010

सोमवार, सितंबर 19, 2011

परियों के पंखों पर : रावेंद्रकुमार रवि का नया शिशुगीत

परियों के पंखों पर


बदली से रंग ले-लेकर,
ख़ुशियों को संग ले-लेकर,
परियों के पंखों पर मैं चित्र बनाऊँगी!


जो मेरे साथ नाचेंगे,
जो मेरे साथ गाएँगे,
कोयल के उन चूज़ों को मित्र बनाऊँगी!


जो मेरे साथ झूमेंगे,
जो मेरे साथ घूमेंगे,
ख़ुशबू के उन फूलों से इत्र बनाऊँगी!

रावेंद्रकुमार रवि

(सर्जन : 15.10.2010)

बुधवार, अगस्त 24, 2011

सरस पायस की प्यारी बहना : नयना को वोट चाहिए

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एक फ़ोटो प्रतियोगिता में जीतने के लिए
सरस पायस की प्यारी बहना : नयना को वोट चाहिए!
उसे वोट देने के लिए उसके फ़ोटो पर क्लिक् कीजिए!
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नयना : मेरी प्यारी बहना
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वोट देने के लिए नीचे दिए गए 
लिंक पर भी क्लिक् कर सकते हैं! 
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http://www.indiaparenting.com/contests/babyphotocontest/babyname-Naynaa/24634
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शुक्रवार, जुलाई 29, 2011

निंदिया आनेवाली है : रावेंद्रकुमार रवि की नई लोरी

निंदिया आनेवाली है


सोजा मेरी गुड़िया रानी,
निंदिया आनेवाली है!
तुझको सपनों की दुनिया में,
लेकर जानेवाली है!



अब तो मींचो सुंदर अँखियाँ,
तुमको वहाँ मिलेंगी परियाँ!
एक परी जादू से तुम में,
ख़ुशबू भरनेवाली है!
सोजा मेरी ... ... .



जब तुम सपनों में जाओगी,
धीरे-धीरे मुस्काओगी!
यही तुम्हारी हँसी रस-भरी,
सबको भानेवाली है!
सोजा मेरी ... ... .



रावेंद्रकुमार रवि 
( चित्रों में है : सोनमन, सरस पायस की बहन )

रविवार, जुलाई 24, 2011

इंद्रधनुष कितना अनूप है : डॉ. रूपचंद्र शास्त्री मयंक का बालगीत

इंद्रधनुष कितना अनूप है

शीतल पवन चली सुखदाई,
रिमझिम-रिमझिम बरखा आई। 


भीग रहे हैं पेड़ों के तन,
भीग रहे हैं आँगन-उपवन।
हरियाली है ख़ूब नहाई।
रिमझिम-रिमझिम बरखा आई। 


मेढक टर्र-टर्र चिल्लाते,
झींगुर हैं मस्ती में गाते।
अब फुहार सबके मन भाई।
रिमझिम-रिमझिम बरखा आई। 


आसमान में बिजली कड़की,
डर से सहमे लड़का-लड़की।
बंदर की तो शामत आई।
रिमझिम-रिमझिम बरखा आई। 


कहीं छाँव है, कहीं धूप है,
इंद्रधनुष कितना अनूप है।
धरती ने है प्यास बुझाई।
रिमझिम-रिमझिम बरखा आई। 

डॉ. रूपचंद्र शास्त्री मयंक

मंगलवार, जुलाई 19, 2011

'सावन' गाता मौसम आया : रावेंद्रकुमार रवि की बालकविता

'सावन' गाता मौसम आया

सावन आया, बादल आए,
'सावन' गाता मौसम आया!
रिमझिम करती बरखा आई,
जिसका रूप सभी को भाया!

बंदर ने डाला है झूला,
ख़ूब दिखाए कलाबाजियाँ!
बुलबुल-मैना नाचीं ऐसे,
जैसे नाचें सुंदर परियाँ!

मेढक ने सुर में कुछ गाया,
कोयल ने भी गीत सुनाए!
 इनका स्वागत किया सभी ने,
मुट्ठी भर-भर फूल उड़ाए! 

 
रावेंद्रकुमार रवि

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