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रविवार, जुलाई 24, 2011

इंद्रधनुष कितना अनूप है : डॉ. रूपचंद्र शास्त्री मयंक का बालगीत

इंद्रधनुष कितना अनूप है

शीतल पवन चली सुखदाई,
रिमझिम-रिमझिम बरखा आई। 


भीग रहे हैं पेड़ों के तन,
भीग रहे हैं आँगन-उपवन।
हरियाली है ख़ूब नहाई।
रिमझिम-रिमझिम बरखा आई। 


मेढक टर्र-टर्र चिल्लाते,
झींगुर हैं मस्ती में गाते।
अब फुहार सबके मन भाई।
रिमझिम-रिमझिम बरखा आई। 


आसमान में बिजली कड़की,
डर से सहमे लड़का-लड़की।
बंदर की तो शामत आई।
रिमझिम-रिमझिम बरखा आई। 


कहीं छाँव है, कहीं धूप है,
इंद्रधनुष कितना अनूप है।
धरती ने है प्यास बुझाई।
रिमझिम-रिमझिम बरखा आई। 

डॉ. रूपचंद्र शास्त्री मयंक

9 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग इस ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो हमारा भी प्रयास सफल होगा!

वीना ने कहा…

बहुत ही खूबसूरत इंद्रधनुष-सा बालगीत...

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

सावन का आनंद तो इसी ब्लॉग पर है।
..सुंदर वर्षा गीत।

रविकर ने कहा…

बहुत ही खूबसूरत ||

"रुनझुन" ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता!... मम्मी अपने बचपन की एक कविता जो इससे काफी मिलती-जुलती है, हमेशा बारिश के दिनों में मुझे सुनाती है...अब मैं मम्मा को ये कविता याद करके सुनाउंगी...थैंक्यू अंकल!

mahendra srivastava ने कहा…

सुंदर कविता, शानदार प्रस्तुति

अरूण साथी ने कहा…

bahut hi sundar

Akshita (Pakhi) ने कहा…

यह तो बहुत प्यारी कविता है..अच्छी लगी.
_________________
'पाखी की दुनिया' में भी घूमने आइयेगा.

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

सुंदर बाल रचना ....

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