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रविवार, जुलाई 24, 2011

इंद्रधनुष कितना अनूप है : डॉ. रूपचंद्र शास्त्री मयंक का बालगीत

इंद्रधनुष कितना अनूप है

शीतल पवन चली सुखदाई,
रिमझिम-रिमझिम बरखा आई। 


भीग रहे हैं पेड़ों के तन,
भीग रहे हैं आँगन-उपवन।
हरियाली है ख़ूब नहाई।
रिमझिम-रिमझिम बरखा आई। 


मेढक टर्र-टर्र चिल्लाते,
झींगुर हैं मस्ती में गाते।
अब फुहार सबके मन भाई।
रिमझिम-रिमझिम बरखा आई। 


आसमान में बिजली कड़की,
डर से सहमे लड़का-लड़की।
बंदर की तो शामत आई।
रिमझिम-रिमझिम बरखा आई। 


कहीं छाँव है, कहीं धूप है,
इंद्रधनुष कितना अनूप है।
धरती ने है प्यास बुझाई।
रिमझिम-रिमझिम बरखा आई। 

डॉ. रूपचंद्र शास्त्री मयंक

शनिवार, फ़रवरी 26, 2011

अपनी बेरी गदराई है : डॉ. रूपचंद्र शास्त्री मयंक की बालकविता



अपनी बेरी गदराई है


लगा हुआ है इनका ढेर।
ठेले पर बिकते हैं बेर।।

रहते हैं काँटों के संग।
इनके हैं मनमोहक रंग।।

जो हरियल हैं, वे कच्चे हैं।
जो पीले हैं, वे पक्के हैं।।


ये सबके मन को ललचाते।
हम बच्चों को बहुत लुभाते।।

शंकर जी को भोग लगाते।
व्रत में हम बेरों को खाते।। 

ऋतु बसंत की मन भाई है।
अपनी बेरी गदराई है।। 


डॉ. रूपचंद्र शास्त्री मयंक

शनिवार, जनवरी 29, 2011

सारा दूध नहीं दुह लेना : डॉ. मयंक की शिशुकविता

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सारा दूध नहीं दुह लेना
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मेरी गइया बहुत निराली,
सीधी-सादी, भोली-भाली।

उसका बछड़ा बहुत सलोना,
प्यारा-सा वह एक खिलौना।

मैं जब गइया दुहने जाता,
वह "अम्माँ" कहकर चिल्लाता।

सारा दूध नहीं दुह लेना,
मुझको भी कुछ पीने देना।

थोड़ा ही ले जाना भइया,
सीधी-सादी मेरी मइया।
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डॉ. रूपचंद्र शास्त्री मयंक
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रविवार, जनवरी 09, 2011

आज है डॉ. मयंक के "नन्हे सुमन" का विमोचन समारोह

ब्लॉगिंग की दुनिया में
डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक" को कौन नहीं जानता!
इसलिए उनके बारे में 
और कुछ न कहते हुए, उनकी इस पुस्तक के 
विमोचन-समारोह में सम्मिलित होने के लिए जा रहा हूँ!


तब तक आप इस संकलन में प्रकाशित
उनकी इस शिशुकविता का आनंद लीजिए! 
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चले देखने मेला
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हाथी दादा सूँड उठाकर
चले देखने मेला! 

बंदर मामा साथ हो लिया
बनकर उनका चेला!
चाट-पकौड़ी ख़ूब उड़ाई
देख चाट का ठेला!
बहुत मज़े से फिर दोनों ने
जमकर खाया केला!

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डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक"
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गुरुवार, अक्टूबर 28, 2010

लड्डू सबके मन को भाते : डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक" की शिशुकविता

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लड्डू सबके मन को भाते!
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लड्डू हैं ये प्यारे-प्यारे,
नारंगी-से कितने सारे!

बच्चे इनको जमकर खाते,
लड्डू सबके मन को भाते!

pranjal_laddu2

प्रांजल का भी मन ललचाया,
लेकिन उसने एक उठाया!

prachi_laddu

अब प्राची ने मन में ठाना,
उसको हैं दो लड्डू खाना!

तुम भी खाओ, हम भी खाएँ,
लड्डू खाकर मौज़ मनाएँ!
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डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक"
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कविता : मयंक जी की लेखनी से
चित्र : मयंक जी के कैमरे से
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बुधवार, मई 26, 2010

मन ख़ुशियों से फूला : डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक" की नई बालकविता


♥ ♥ मन ख़ुशियों से फूला ♥ ♥


उमस-भरा गरमी का मौसम,
तन से बहे पसीना!
कड़ी धूप में कैसे खेलूँ,
इसने सुख है छीना!!

कुल्फी बहुत सुहाती मुझको,
भाती है ठंडाई!
दूध गरम ना अच्छा लगता,
शीतल सुखद मलाई!!

पंखा झलकर हाथ थके जब,
मैंने झूला झूला!
ठंडी-ठंडी हवा लगी तब,
मन ख़ुशियों से फूला!!

डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक"
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♥ (चित्र में : प्राची) ♥


शुक्रवार, मई 14, 2010

बैठ खेत में इसको खाया : डॉ. रूपचंद्र शास्त्री 'मयंक' की एक बालकविता




बैठ खेत में इसको खाया

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जब गरमी की ऋतु आती है!
लू तन-मन को झुलसाती है!!

तब आता तरबूज सुहाना!
ठंडक देता इसको खाना!!


यह बाज़ारों में बिकते हैं!
फुटबॉलों जैसे दिखते हैं!!

एक रोज़ मन में यह ठाना!
देखें इनका ठौर-ठिकाना!!


पहुँचे जब हम नदी किनारे!
बेलों पर थे अजब नज़ारे!!

कुछ छोटे, कुछ बहुत बड़े थे!
जहाँ-तहाँ तरबूज पड़े थे!!


उनमें से फिर एक उठाया!
बैठ खेत में उसको खाया!!


उसका गूदा लाल-लाल था!
मीठे रस से भरा माल था!!

डॉ. रूपचंद्र शास्त्री 'मयंक'


रविवार, फ़रवरी 21, 2010

श्रम करने से मिले सफलता : डॉ. रूपचंद्र शास्त्री मयंक का गीत

के लिए "सरस पायस" को आशीष के रूप में मिला
का बालगीत इतना अच्छा है
कि मैं उसे पोस्ट के रूप में प्रकाशित करने से
अपने आप को रोक नहीं पाया!

श्रम करने से मिले सफलता
[22022009273.jpg]

खेल-कूद में रहे रात-दिन,
अब पढ़ना मजबूरी है ।
सुस्ती-मस्ती छोड़,
परीक्षा देना बहुत जरूरी है ।।

मात-पिता, विज्ञान-गणित हैं,
ध्यान इन्हीं का करना है ।
हिंदी की बिंदी को,
माता के माथे पर धरना है ।।

देव-तुल्य जो अन्य विषय हैं,
उनके भी सब काम करेंगे ।
कर लेंगे, उत्तीर्ण परीक्षा,
अपना ऊँचा नाम करेंगे ।।

श्रम करने से मिले सफलता,
कविता यही सिखाती है ।
रवि की पहली किरण हमेशा,
नया सवेरा लाती है ।।


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