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बुधवार, मई 26, 2010

मन ख़ुशियों से फूला : डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक" की नई बालकविता


♥ ♥ मन ख़ुशियों से फूला ♥ ♥


उमस-भरा गरमी का मौसम,
तन से बहे पसीना!
कड़ी धूप में कैसे खेलूँ,
इसने सुख है छीना!!

कुल्फी बहुत सुहाती मुझको,
भाती है ठंडाई!
दूध गरम ना अच्छा लगता,
शीतल सुखद मलाई!!

पंखा झलकर हाथ थके जब,
मैंने झूला झूला!
ठंडी-ठंडी हवा लगी तब,
मन ख़ुशियों से फूला!!

डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक"
-------------------------------------------
♥ (चित्र में : प्राची) ♥


11 टिप्‍पणियां:

sangeeta swarup ने कहा…

गर्मी में ठंडी फुहार देती सुन्दर कविता.....और प्राची तो खूब झूला झूल रही है.....

राजेन्द्र मीणा ने कहा…

सुन्दर और भोली कविता ....बहुत खूब !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

रवि जी!
आखिरकार आपने सरस-पायस के लिए
बालकविता लिखना ही ली!
--
आपके आग्रह में बल है!
--
सरस पायस पर इसे सुन्दर ढंग से
प्रकाशित करने के लिए आभार!

माधव ने कहा…

वाह गर्मी में झुला ! वैसे झुला तो सावन के मौसम में झूलते है , पर अब मै भी try करता हूँ, कविता अच्छी है , कुल्फी इसक्रीम तो हमें भी अच्छी लगती है

अक्षिता (पाखी) ने कहा…

सुन्दर झूला..मेरा भी मन खुशियों से फूला..

_________________
'पाखी की दुनिया' में देखें ' सपने में आई परी'

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत प्यारी कविता गर्मी के ठंडक देती

Suman ने कहा…

nice

डॉ. देशबंधु शाहजहाँपुरी ने कहा…

bahut sundar kavita aur bahut sundar prachi aur uska jhula...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आज सरस पायस का सक्रियता क्रमांक 93 है!
बधाई!

श्रीमती अमर भारती ने कहा…

झूला तो कभी भी झूला जा सकता है!
अभिनव सन्देश देती सुन्दर बाल कविता!

दीनदयाल शर्मा ने कहा…

डॉ. मयंक जी की कविता की प्रतिक्रिया में ...

गर्मी / दीनदयाल शर्मा

तपता सूरज लू चलती है ,
हम सबकी काया जलती है..

गर्मी आग का है तंदूर
इससे कैसे रहेंगे दूर

मन करता हम कुल्फी खाएं,
कूलर के आगे सो जाएँ.

खेलने को हम हैं मजबूर,
खेलेंगे हम सभी जरुर

पेड़ों की छाया में चलकर ,
झूला झूल के आयेंगे,

फिर चाहे कितनी हो गर्मी,
इस से ना घबराएंगे.

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