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सोमवार, मई 24, 2010

कितने सुंदर हैं गुब्बारे : कृष्णकुमार यादव की नई शिशुकविता


कितने सुंदर हैं गुब्बारे

लाल-बैंगनी-हरे-गुलाबी,
रंग-बिरंगे हैं ये प्यारे।
एक नहीं हैं इतने सारे,
कितने सुंदर हैं गुब्बारे।

गुब्बारों की दुनिया होती,
कितनी-प्यारी और निराली।
हँस देते रोनेवाले भी,
खिल जाती चेहरे पर लाली।

हम सब दौड़ें इनके पीछे,
कसकर पकड़े इन्हें हाथ में।
सीना ताने घूम रहे हैं,
हम सब इनको लिए साथ में।

कृष्णकुमार यादव
--------------------------------
(चित्र में : आदित्य रंजन)

21 टिप्‍पणियां:

माधव ने कहा…

बहुत प्यारे गुब्बारे है , सही में हम बच्चो के लिए प्यारे है

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत प्यारे रंग बिरंगे, लेकिन बच्चो को इस से दुर ही रखे

Udan Tashtari ने कहा…

बेहतरीन कविता और आदि की तस्वीर!! डबल आनन्द रहा!!

बेचैन आत्मा ने कहा…

सुंदर बाल गीत.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

फूँक मार कर इन्हें फुलाओ।
हाथों में ले इन्हें झुलाओ।।
सजे हुए हैं कुछ दुकान में।
कुछ उड़ते हैं आसमान में।।
मोहक छवि लगती है प्यारी।
गुब्बारों की महिमा न्यारी।।

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

जितना सुन्दर गीत, उतनी ही सुन्दर तस्वीर.

Dr. Brajesh Swaroop ने कहा…

बहुत सुन्दर गुब्बारे..पढ़कर अपना बचपन याद आ गया, जब मेले में जाकर गुब्बारा जरुर खरीदते थे. के.के. यादव जी व रवि जी को बधाई...

Akanksha~आकांक्षा ने कहा…

गुब्बारों की दुनिया होती,
कितनी-प्यारी और निराली।
हँस देते रोनेवाले भी,
खिल जाती चेहरे पर लाली।

...यही तो गुब्बारों की महिमा है..सुन्दर बाल-कविता.

Ratnesh Kr. Maurya ने कहा…

गुब्बारे तो मुझे भी बहुत प्रिय हैं. इन्हें देखते ही मेरा बचपना जग जाता है. भाई कृष्ण कुमार जी ने बड़ी मनभावन कविता लिखी..हार्दिक बधाई.

अक्षिता (पाखी) ने कहा…

अले वाह कित्ते प्याले-प्याले गुब्बाले. ये तो मुझे भी चाहिए..और ये आदि गुब्बालों के साथ क्या कर रहे हैं, मैं भी तो देखूं.

अक्षिता (पाखी) ने कहा…

पापा ने तो बड़ी सुन्दर-सुन्दर कविता लिखी इन गुब्बालों पर..बढ़िया है.

SR Bharti ने कहा…

बहुत ख़ूबसूरत और भावपूर्ण रचना लिखी है गुब्बारों पर. वाकई काबिले तारीफ़ है! कृष्ण कुमार जी की यह रचना पढ़कर मुझे अपना गाँव और फिर गुब्बारों की याद आ गयी! अब तो गुब्बारे हर जगह दिख जाते हैं, पर पहले तो ये यदा-कदा ही दिखते थे. रवि जी ने भी इसे खूबसूरती से प्रस्तुत किया है.

Ram Shiv Murti Yadav ने कहा…

हँस देते रोनेवाले भी,
खिल जाती चेहरे पर लाली।
..बहुत सुन्दर व सटीक लिखा..बधाई.

Amit Kumar ने कहा…

गुनगुनाने लायक मनभावन शिशु- गीत...बधाई.

अभिलाषा ने कहा…

बेहतरीन शिशु गीत...गुब्बारों की निराली दुनिया भला किसे नहीं भाती.

KK Yadava ने कहा…

रवि जी, आपका आभार जो मेरी इस बाल-कविता को आपने इतनी खूबसूरती से प्रस्तुत किया...

ersymops ने कहा…

अति उत्तम रहा ये शिशु गीत. कृष्ण जी एवं रवि जी को कोटिश : बधाइयाँ.

ersymops ने कहा…

ये आदित्य क्या गुब्बारों को खाने का अभ्यास कर रहे हैं..

Laviza ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
●๋• लविज़ा | Laviza ●๋• ने कहा…

अले वाह !! मैंने भी सन्डे को एक शादी में बहुत सारे गुब्बारे फोड़े :)

डॉ. देशबंधु शाहजहाँपुरी ने कहा…

gubbbare khelne ka mera bhi man ho raha hai...kash...mai bhi itna chota hota...

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