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शनिवार, दिसंबर 24, 2011

तोतेजी : अनिल रस्तोगी की एक शिशुकविता

तोतेजी


दिन-भर टें-टें-टें-टें करते,
हरे परों के तोतेजी!
खा जाते हैं ढेरों मिर्चे,
ज़रा न रोते तोते जी!

अनिल रस्तोगी
(एक फूल, जो असमय ही मुरझा गया!)
(पुण्य तिथि : 24.12.1986)

रविवार, जून 26, 2011

उसको क्यों खा जाते हो? : निरंकारदेव सेवक की शिशुकविता

उसको क्यों खा जाते हो?

लाल टमाटर! लाल टमाटर!
मैं तो तुमको खाऊँगा।

रुक जाओ, मैं थोड़े दिन में
और बड़ा हो जाऊँगा।

लाल टमाटर! लाल टमाटर!
मुझको भूख लगी भारी।

भूख लगी है तो तुम खा लो
ये गाजर-मूली सारी।

लाल टमाटर! लाल टमाटर!
मुझको तो तुम भाते हो।

जो तुमको भाता है, भैया!
उसको क्यों खा जाते हो?

निरंकारदेव सेवक

सोमवार, जून 20, 2011

चकमक में सजी राज कुमारी की दो कविताएँ

बाल विज्ञान पत्रिका चकमक का
जून 2011 का अंक भी हमेशा की तरह
विशेष सज-धज के साथ ही आया है!
उसके मुखपृष्ठ पर छपी रचना ने ही मन मोह लिया!
- आप भी पढ़िए -
कविता को स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए
चूज़े (मुर्गी के बच्चे) पर चट्का लगाइए!

शनिवार, जून 18, 2011

कोई युक्ति सुझाओ : डॉ. नागेश पांडेय संजय की शिशुकविता


कोई युक्ति सुझाओ

मेरे नाम अनेक, दोस्तो,
मैं छोटा-सा भोलू।
कोई मुझसे सोनू कहता,
कोई  कहता गोलू।

दादा जी कहते हैं टिंकू,
दादी कहतीं कालू।
मम्मी मुझसे लल्ला कहतीं,
पापा कहते लालू।

मेरे घर जब आता कोई,
कहता - नाम बताओ।
चुप रह जाता हूँ मैं, तुम ही
कोई युक्ति सुझाओ। 


डॉ. नागेश पांडेय संजय 
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(चित्र में हैं : आदित्य रंजन)
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शुक्रवार, जून 10, 2011

गाजर और टमाटर : मेहुल कपाड़िया की शिशुकविता



गाजर और टमाटर
  
बच्चो, खाओ कच्ची गाजर, 
नीबूखीरा और टमाटर! 
  
  
लाल-लाल तुम बन जाओगे,  
सुंदर बच्चे कहलाओगे! 

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मेहुल कपाड़िया 
(चित्र में हैं : सान्वी और नीहारिका)
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साभार  साभार
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सोमवार, मई 23, 2011

हुआ प्यार से : रावेंद्रकुमार रवि की नई शिशुकविता

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हुआ प्यार से 
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एक टमाटर मोटा-मोटा, 
मोटे उसके गाल! 
खाने में है खट्टा-मीठा, 
हुआ प्यार से लाल! 
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रावेंद्रकुमार रवि
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सोमवार, मई 02, 2011

मीठी-मीठी बात : रावेंद्रकुमार रवि की शिशुकविता


मेरे जन्म-दिवस पर 
दुनिया के सभी बच्चों के लिए 
मेरी तरफ से बहुत-सी शुभकामनाएँ, 
मेरी इस मीठी-मीठी सरस कविता के साथ!

मीठी-मीठी बात

मेरी माँ ने 
मुझे खिलाई - 
मीठी पूरी 
और दही !

उसके बाद 
कान में मेरे 
मीठी-मीठी 
बात कही --

वे बच्चे 
मीठे होते हैं, 
जो बोलें 
मीठी बोली ! 

मेरा फोटो

रावेंद्रकुमार रवि

बुधवार, अप्रैल 20, 2011

चूहा नाचा : आरती के चित्र के साथ रवि की शिशुकविता

चूहा नाचा

चुहिया ने जब मटर खिलाई, 
चूहा नाचा ज़ोर से! 
बोला, "मैंने तो सीखा है, 
नाच सुहाना मोर से!"




आरती 
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सोमवार, मार्च 14, 2011

शनिवार, जनवरी 29, 2011

सारा दूध नहीं दुह लेना : डॉ. मयंक की शिशुकविता

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सारा दूध नहीं दुह लेना
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मेरी गइया बहुत निराली,
सीधी-सादी, भोली-भाली।

उसका बछड़ा बहुत सलोना,
प्यारा-सा वह एक खिलौना।

मैं जब गइया दुहने जाता,
वह "अम्माँ" कहकर चिल्लाता।

सारा दूध नहीं दुह लेना,
मुझको भी कुछ पीने देना।

थोड़ा ही ले जाना भइया,
सीधी-सादी मेरी मइया।
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डॉ. रूपचंद्र शास्त्री मयंक
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बुधवार, जनवरी 19, 2011

आओ पास, तुम्हें नहलाऊँ : चंद्रमोहन दिनेश

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आओ पास, तुम्हें नहलाऊँ
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सुअर, सुअर, ओ मेरे भइया!
चले झूमते भरी तलइया!

कितने गंदे रहते हो तुम!
साफ़ नहीं क्यों रहते हो तुम?

आओ पास, तुम्हें नहलाऊँ!
तुमको अपने साथ खिलाऊँ! 
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चंद्रमोहन दिनेश 
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सुअरों के चित्र : गूगल सर्च से साभार
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रविवार, जनवरी 09, 2011

आज है डॉ. मयंक के "नन्हे सुमन" का विमोचन समारोह

ब्लॉगिंग की दुनिया में
डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक" को कौन नहीं जानता!
इसलिए उनके बारे में 
और कुछ न कहते हुए, उनकी इस पुस्तक के 
विमोचन-समारोह में सम्मिलित होने के लिए जा रहा हूँ!


तब तक आप इस संकलन में प्रकाशित
उनकी इस शिशुकविता का आनंद लीजिए! 
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चले देखने मेला
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हाथी दादा सूँड उठाकर
चले देखने मेला! 

बंदर मामा साथ हो लिया
बनकर उनका चेला!
चाट-पकौड़ी ख़ूब उड़ाई
देख चाट का ठेला!
बहुत मज़े से फिर दोनों ने
जमकर खाया केला!

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डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक"
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रविवार, दिसंबर 26, 2010

रुको कबूतर : डॉ. नागेश पांडेय "संजय" की नई शिशुकविता



दानेवाला
फ़र्श देखकर
आए ढेर कबूतर!

चोंच मारते,
फिर झुँझलाते
उड़ जाते फिर फर-फर!

रुको, रुको,
मत उड़ो कबूतर,
मैं दाना ले आऊँ!

सच्ची-मुच्ची
खाओ फिर तुम,
मैं मन में हर्षाऊँ!


छाया एवं कविता

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डॉ. नागेश पांडेय "संजय"
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