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रविवार, दिसंबर 26, 2010

रुको कबूतर : डॉ. नागेश पांडेय "संजय" की नई शिशुकविता



दानेवाला
फ़र्श देखकर
आए ढेर कबूतर!

चोंच मारते,
फिर झुँझलाते
उड़ जाते फिर फर-फर!

रुको, रुको,
मत उड़ो कबूतर,
मैं दाना ले आऊँ!

सच्ची-मुच्ची
खाओ फिर तुम,
मैं मन में हर्षाऊँ!


छाया एवं कविता

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डॉ. नागेश पांडेय "संजय"
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6 टिप्‍पणियां:

डॉ. नागेश पांडेय "संजय" ने कहा…

your editing is माशा अल्लाह

Satish Chandra Satyarthi ने कहा…

एकदम लयबद्ध लिखा है आपने..
बिलकुल जैसी बचपन में किताबों में पढते थे...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" ने कहा…

अरे वाह!
कितनी जीवन्त कविता है!
नागेश जी को बहुत-बहुत बधाई!

Akshita (Pakhi) ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता....बधाई.

sheelu ने कहा…

कबूतर पर डा. नागेश सर की कविता पढ़कर मन तारो ताजा हो गया . फोटो इतने अच्छे आप कैसे ले आते हैं ?

Yogesh Kumar ने कहा…

वहुत सुन्दर

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