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रविवार, जनवरी 17, 2010

लगी झूमने फिर खेतों में : डॉ॰ देशबंधु शाहजहाँपुरी का एक बालगीत

लगी झूमने फिर खेतों में


कुहू-कुहूकर कोयल सबको मधुरिम गीत सुनाती!
फूलों के चेहरों पर खिलकर मुस्काहट सज जाती!!


मस्त पवन के साथ महककर झूम उठी हरियाली!
पीपल के पत्तों ने मिलकर ख़ूब बजाई ताली!!


बगिया में गेंदा-गुलाब संग सभी फूल मुस्काते!
मतवाले भँवरे गुंजनकर होली-गीत सुनाते!!


लगी झूमने फिर खेतों में सरसों पीली-पीली!
उसके फूलों से बतियाती तितली रंग-रँगीली!!


यह सब देख लगे धरती पर स्वर्ग उतर आया है!
फागुन के मौसम में चहुँदिश रंग बरस छाया है!!


डॉ॰ देशबंधु शाहजहाँपुरी




7 comments:


रंजन ने कहा…
होली की रंगबिरंगी रचना.. बधाई.. होली की शुभकामनाऐं..

डॉ. देशबंधु शाहजहाँपुरी ने कहा…
रंजन भाई को मेरी रचना पसंद आई आपको रंगीन बधाई

डॉ. देशबंधु शाहजहाँपुरी ने कहा…
रंजन भाई को मेरी रचना पसंद आई आपको रंगीन बधाई

neha ने कहा…
आपकी होली की कविता बहुत प्यारी है आपको बधाई!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…
यह पोस्टलेखक के द्वारा निकाल दी गई है.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…
देशबन्धु की इस कविता में, कुदरत का सिंगार सरस है। रवि के रंगों से जग-मग, यह स्वाद भरी पायस है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…
देशबन्धु की इस कविता में, कुदरत का सिंगार सरस है। रवि के रंगों से जग-मग, यह स्वाद भरी पायस है।

6 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

सुन्दर फूलों के साथ इस बालगीत में महक आ गई है!


लगी झूमने फिर खेतों में सरसों पीली-पीली!
उसके फूलों से बतियाती तितली रंग-रँगीली!!

इन पंक्तियों का रंग दब गया है। दिखाई नहीं दे रहीं हैं।

ज्योति सिंह ने कहा…

यह सब देख लगे धरती पर स्वर्ग उतर आया है!

फागुन के मौसम में चहुँदिश रंग बरस छाया है!!
bahut hi sundar rachna

डॉ टी एस दराल ने कहा…

बहुत खूबसूरत तस्वीरें । सुन्दर प्रस्तुति के साथ।
शुभकामनायें।

सत्य नारायण सत्य ने कहा…

बहुत सुंदर रचना ।

GK Khoj ने कहा…

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GK Khoj ने कहा…

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