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बुधवार, मई 26, 2010

मन ख़ुशियों से फूला : डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक" की नई बालकविता


♥ ♥ मन ख़ुशियों से फूला ♥ ♥


उमस-भरा गरमी का मौसम,
तन से बहे पसीना!
कड़ी धूप में कैसे खेलूँ,
इसने सुख है छीना!!

कुल्फी बहुत सुहाती मुझको,
भाती है ठंडाई!
दूध गरम ना अच्छा लगता,
शीतल सुखद मलाई!!

पंखा झलकर हाथ थके जब,
मैंने झूला झूला!
ठंडी-ठंडी हवा लगी तब,
मन ख़ुशियों से फूला!!

डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक"
-------------------------------------------
♥ (चित्र में : प्राची) ♥


सोमवार, मई 24, 2010

कितने सुंदर हैं गुब्बारे : कृष्णकुमार यादव की नई शिशुकविता


कितने सुंदर हैं गुब्बारे

लाल-बैंगनी-हरे-गुलाबी,
रंग-बिरंगे हैं ये प्यारे।
एक नहीं हैं इतने सारे,
कितने सुंदर हैं गुब्बारे।

गुब्बारों की दुनिया होती,
कितनी-प्यारी और निराली।
हँस देते रोनेवाले भी,
खिल जाती चेहरे पर लाली।

हम सब दौड़ें इनके पीछे,
कसकर पकड़े इन्हें हाथ में।
सीना ताने घूम रहे हैं,
हम सब इनको लिए साथ में।

कृष्णकुमार यादव
--------------------------------
(चित्र में : आदित्य रंजन)

शुक्रवार, मई 21, 2010

हम भी उड़ते : रावेंद्रकुमार रवि का नया शिशुगीत



हम भी उड़ते



हम भी उड़ते आसमान में

जैसे उड़े पतंग!

सजाकर सुंदर-सुंदर रंग!


देख-देख जिनकी उड़ान हम

रह जाते हैं दंग,

वे चिड़ियाएँ उड़ें मज़े से

मस्त हवा के संग!

सजाकर ... ... .


उड़ती हैं तितलियाँ बाग़ में

भर पंखों में रंग,

रुक-रुक जो कहतीं फूलों से -

"चलो हमारे संग!"

सजाकर ... ... .


रावेंद्रकुमार रवि


सोमवार, मई 17, 2010

सबके मन को भाए : दीनदयाल शर्मा की एक बालकविता

सबके मन को भाए


इसके बिन है सरकस सूना,
दर्शक एक न आए।
उल्टे-सीधे कपड़े पहने,
करतब ख़ूब दिखाए।

गुमसुम कभी न देखा इसको,
हर पल यह मुस्काए।
ख़ुद तो हँसता ही रहता है,
सबको ख़ूब हँसाए।

गिरते-गिरते बच जाता यह,
पल-पल में इतराए।
जोकर ही हो सकता है, जो
सबके मन को भाए।

दीनदयाल शर्मा

(इस कविता के प्रस्तुतीकरण पर रीझकर शर्मा जी ने यह कली उपहार में भेजी है!)

(इस कविता के प्रस्तुतीकरण पर रीझकर शर्मा जी ने यह कली उपहार में भेजी है!)

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