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मंगलवार, फ़रवरी 08, 2011

कोकिल गाता है : रावेंद्रकुमार रवि की बालकविता

कोकिल गाता है



जब वासंती
दिन आते हैं,
जन-जन के
मन मुस्काते हैं!



पुरवा चलती
धीरे-धीरे,
भोर उतरती
नदिया तीरे!



आम्र-मंजरी
रस बरसाती,
कलियों से
बगिया सज जाती!



सहसा पत्तों के
पीछे से,
मीठा-मीठा
स्वर आता है!



कुहुक-कुहुककर
कुहुक-कुहुककर
नव सुर में 
कोयल गाता है!

रावेंद्रकुमार रवि

9 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" ने कहा…

वासन्ती मौसम में आपके गीत ने ने तो बसन्त को चहका दिया है!

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

बहुत सरस बसंत का बालगीत...... बसंत पंचमी की शुभकामनायें.....

JHAROKHA ने कहा…

raghvendra ji
bahut hi sundar avam pyari kavita basant par likhi hai aapne lag raha hai jaisa aapne likha hai vaisa apne aas-pass mahsus bhi karti ja rahi hun .
isi ko to kavita kahte hai ki padhne wala bas usme duub kar rah jaare
bahut hi badhiyaprastuti
poonam

चैतन्य शर्मा ने कहा…

बहुत प्यारा बालगीत

राज भाटिय़ा ने कहा…

बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं.

वाणी गीत ने कहा…

बखुत प्यारा -सा गीत !

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

.

कोकिल के गाने से पहले की बासंतिक तैयारी .... बहुत खूब.

.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" ने कहा…

सरल शब्दों में रचा गया बहुत ही प्यारा बाल गीत!
चित्र तो एक भी नहीं खुल रहा है इसमें!

Saba Akbar ने कहा…

प्यारा बालगीत...

चित्र तो यहाँ भी नहीं खुल रहे :(

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