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गुरुवार, फ़रवरी 24, 2011

मालूम नहीं : रावेंद्रकुमार रवि की बालकहानी


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मालूम नहीं
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रावेंद्रकुमार रवि
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राहुल के पापा फौज में नौकरी करते हैं । आज चार महीने के बाद वे घर आनेवाले हैं । राहुल बेचैनी से उनका इंतज़ार कर रहा है । उसे पापा से बहुत-सारी बातें करनी हैं । उसके मन में उन्हें तीसरी मंजिल पर बनी अंटिया दिखाने की सबसे ज़्यादा इच्छा है ।

अंटिया पर चढ़कर पतंगें देखने में उसे बहुत मज़ा आता है । वह रोज़ाना चुपके से तीन-चार बार अंटिया पर ज़रूर जाता है । अंटिया पर रेलिंग नहीं बनी है और वह अभी छोटा है । इसलिए सब उसे वहाँ जाने पर डाँटते हैं - ‘‘अंटिया पर मत जाना, नहीं तो गिर जाओगे ।’’

यह डाँट उसे बहुत बुरी लगती है ।

वह यह सोचकर बहुत ख़ुश है कि जब वह अंटिया पर ले जाकर पापा को पतंगें दिखाएगा और पतंगों की बातें करेगा, तो पापा ख़ुश हो जाएँगे । पर पापा के आने के बाद दो-तीन दिन तक भी वह उनसे अपनी बात नहीं कह पाता है । उनके लाए हुए खिलौने खेलता रहता है और दूसरी बातें करता रहता है ।

एक दिन जब पापा ख़ुद ही अंटिया पर चढ़ने लगे, तो वह भी दौड़कर वहाँ पहुँच गया । उसने देखा, पापा पतंग की ओर देख रहे हैं । वह ख़ुश हो गया ।

वह पापा से पतंगवाली कोई बात कहना ही चाह रहा था कि पापा ने उसे देख लिया । वे बोले - ‘‘अरे ! तुम यहाँ क्यों आ गए ?’’

उसका चेहरा उतर गया ।

पापा की आवाज़ तेज़ हो गई - ‘‘यहाँ से पतंग देखते होगे ?’’

तब वह सिर झुकाकर धीरे-से बोला - ‘‘नहीं, मैं नीचे से देखता हूँ ।’’

पापा का गुस्सा बढ़ गया । वे बोले - ‘‘मुझे बेवकूफ़ बनाते हो ?’’

‘‘नहीं, पापा !’’

उसके यह कहने के बाद भी पापा उसे एक्टिंग करके समझाने लगे - ‘‘यहाँ आकर पतंगें मत देखा करो । मान लो, पतंग देखते-देखते पीछे की ओर चलते गए और ध्यान नहीं रहा, तो नीचे गिर जाओगे ।’’

राहुल को बहुत बुरा लगा ।

पापा ने उससे कुछ प्रश्नों के उत्तर पूछना शुरू कर दिया ।

‘‘मालूम नहीं ।’’

राहुल को ज़्यादातर प्रश्नों के उत्तर पता हैं, पर उसने हर बार यही उत्तर दिया । वह मन ही मन पापा से गुस्सा जो हो गया है - इतने दिनों के बाद तो आते हैं और ... ... ... ... ... ... ...

कुछ देर बाद पापा ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा - ‘‘चलो,  नीचे चलें ।’’

जीने से उतरते समय पापा ने एक और प्रश्न का उत्तर पूछा - ‘‘बेवकूफ़ का मतलब जानते हो ?’’

वह फिर बोला - ‘‘मालूम नहीं ।’’

तब तक वे नीचे आ गए । पापा उसकी मालूम नहींपर झल्लाते हुए बोले - ‘‘जिन बच्चों को कुछ मालूम नहीं होता है, उन्हीं को बेवकूफ़ कहते हैं । समझ में आया ?’’

राहुल ने कह दिया - ‘‘हाँ ।’’

इसके बाद पापा छत पर इधर-उधर टहलने लगे । कुछ देर बाद उन्हें लगा कि राहुल छत पर नहीं है । वे गली की ओर नीचे झाँककर देखते हैं - राहुल एक पिल्ले के साथ ख़ुश होकर खेल रहा है ।

पापा भी राहुल को हर समय इसी तरह ख़ुश देखना चाहते हैं । वे भी नीचे आ गए और बाज़ार की ओर चल दिए । उन्होंने मुड़कर देखा - राहुल पिल्ले के आगेवाले दोनों पंजे पकड़कर उसे खड़ा कर रहा है । ऐसा लग रहा है कि वह उसे डांस सिखाने जा रहा है ।

अगले दिन छुट्टी है । छुट्टीवाले दिन माँ उसे कुछ ज़्यादा देर तक सो लेने देती हैं ।

जब वह सोकर उठा, तो माँ ने उसे अख़बार देते हुए कहा - ‘‘पापा को दे आओ ।’’

‘‘पापा कहाँ हैं ?’’

‘‘ऊपर अंटिया पर ।’’

यह सुनकर उसे कलवाली बातें याद आने लगीं, पर वह जीने की सीढ़ियाँ चढ़ने लगा ।

उसने सोचा कि वह पापा को अख़बार देकर तुरंत नीचे चला आएगा ।

छत पर पहुँचते ही उसने देखा कि पापा के साथ और भी दो आदमी अंटिया पर खड़े हैं । वह धीरे-धीरे अंटियावाला जीना भी चढ़ने लगा । ऊपर पहुँचकर उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा । पापा ने उसे गोद में उठाकर उसका गाल अपने गाल से सटा लिया ।

पापा ने शरारत से मुस्कुराते हुए उससे पूछा - ‘‘आपका क्या नाम है ?’’

राहुल भी उन्हीं के अंदाज़ में मुस्कुराते हुए बोला - ‘‘मालूम नहीं ।’’

रेलिंग बनानेवाले मिस्त्री और मज़दूर अपना काम शुरू कर चुके हैं । पड़ोस की छत से नन्हे सरदारजी ने ठुमके दे-देकर अपनी पतंग आसमान की ओर बढ़ानी शुरू कर दी है । इस समय वह अंटिया के ठीक ऊपर आकर नाच रही है ।


-- रावेंद्रकुमार रवि

12 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

सुन्दर बाल कथा।

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

हृदयस्पर्शी बाल कथा ....... सुंदर

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

.

कथा में कोई जबरन कल्पना नहीं की गई.
मन इस बाल कथा की प्रशंसा में बहुत कुछ कह देना चाहता है
लेकिन क्या? "मालुम नहीं"

.

शुभम जैन ने कहा…

बहुत सुन्दर कहानी...इशिता को जरुर सुनाउगी...

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

Mithilesh dubey ने कहा…

बहुत ही बढ़िया रचना लगी,बधाई



नारी स्वंतत्रता के मायने

चैतन्य शर्मा ने कहा…

बहुत अच्छी लगी कहानी ...मालूम है....

घनश्याम मौर्य ने कहा…

अच्‍छी बालकथा है। सामान्‍य होते हुए भी अपने आप में एक विशिष्‍ट कहानी। भावपक्ष एवं वर्णनात्‍मक शैली प्रशंसनीय है।

डॉ. नागेश पांडेय "संजय" ने कहा…

बताऊँ ,कहानी कैसी है-
(मालूम नहीँ)-बहुत मजेदार । और इस बहाने सरस पायस मेँ अच्छी कहानियाँ भी पढ़ने को मिलने लगी हैँ ।

Er. सत्यम शिवम ने कहा…

आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (26.02.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.uchcharan.com/
चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

Dr Varsha Singh ने कहा…

Interesting Story...

purnima ने कहा…

बहुत ही सुन्दर कहानी हें.........

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