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रविवार, अगस्त 08, 2010

तब तक-तब तक : डॉ. नागेश पांडेय संजय का एक शिशुगीत

तब तक-तब तक
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कब तक-कब तक?
जब तक-जब तक, तब तक-तब तक!


रिमझिम-रिमझिम,
कब तक-कब तक?
बादल के झोलों में है जल,
जब तक-जब तक, तब तक-तब तक!

भूख लगी है,
कब तक-कब तक?
खाना-पानी दें ना नानी,
जब तक-जब तक, तब तक-तब तक!

मेल-दोस्ती,
कब तक-कब तक?
जब तक झगड़े को हम रगड़ें,
जब तक-जब तक, तब तक-तब तक!

कहो अँधेरा,
कब तक-कब तक?
हो ना जाए सुखद सवेरा,
जब तक-जब तक, तब तक-तब तक!


डॉ. नागेश पांडेय संजय

शुक्रवार, अगस्त 06, 2010

किलक उठा मन : रावेंद्रकुमार रवि की एक बालकविता

किलक उठा मन

बादल मशकें
भर-भर लाए
सागर के पानी से नभ में!
लगे छिड़कने
फिर यह पानी
वे धरती के हर उपवन में!



गरमी से आकुल
धरती पर
जब पानी का पड़ा फुहारा!
लगी पुलकने
खुश हो धरती
भूल गई अपना दुख सारा!



उपवन-उपवन
लगा चहकने
ओढ़ दुशाला हरियाली का!
रंग-बिरंगे फूल
खिल उठे
किलक उठा मन हर माली का!


रावेंद्रकुमार रवि

बुधवार, अगस्त 04, 2010

बहुत सुरीली थी : चुलबुल की गुनगुन : सरस चर्चा ( 8 )

हवा घुस गई है बालों में, आँखों में है रंगत आई!
मची गुदगुदी है गालों में, ओंठों पर मुस्कान सजाई!


इस बार इशिता ने अक्सा बीच पर ख़ूब मस्ती करते हुए
अपने दोस्तों के साथ पिकनिक मनाई!


मार्वे बीच पर उसने चश्मा लगाकर
पानी में भी ख़ूब छपाक-छइ की! हम भी करें चलकर!


३१ जुलाई को अक्षयांशी ने अपनी छोटी बहन
पौच का जन्म-दिन बहुत ख़ुशी के साथ मनाया!
वैसे तो उसका नाम पलक है,
पर प्यार से सब उसे पौच जी कहते हैं!
अब वह एक साल की हो गई है!
चलिए, उसके ब्लॉग पर चलकर उसकी बहना को बधाई देते हैं!


रिमझिम ने अपना घर
झिलमिलाते सितारों से भरकर
तितलियों को उसमें रहने की जगह दे दी!
एक सुंदर-सी कविता भी रची!
आइए, चलकर उसकी कविता पढ़ते हैं!


आप मोबाइल से कैसी-कैसी बातें करते हैं?
बाल-दुनिया पर इस बार मोबाइल से
अच्छी-अच्छी बातें करना सिखाया जा रहा है!
हम भी यह कविता पढ़ने चलते हैं!


आदित्य ने लैपटॉप पर एम. एस. वर्ड में लिखना शुरू कर दिया है!
हम उसके जल्दी स्वस्थ होने की कामना करते हैं,
क्योंकि वह बुखार से जूझ रहा है!
आप ख़ुद ही देख लीजिए -
आदि का चेहरा ही सब कुछ बता रहा है!


पाखी को एक और तोहफा मिला है!
एक क़िताब के मुखपृष्ठ पर उसका फ़ोटो छापा गया!
पाखी को बहुत-बहुत बधाई!


माधव के नानी-नाना आजकल दिल्ली आए हुए हैं!
वह उनके साथ ख़ूब मौज़ मना रहा है!
नानी से मालिश करवा रहा है और ख़ूब घूम रहा है!
सेंट्रल पार्क, कनाट प्लेस में उसकी मस्ती देखिए!


"सरस पायस" पर पहले नाचने-गाने की बात हुई!


फिर "सरस पायस" पर कुछ नन्हे-प्यारे चूज़े भी मुस्कराए!


लेकिन आज "सरस पायस" बहुत उदास है!



मंगल 3.08.2010 की सुबह 5.०० बजे सब कुछ अमंगल करके .............



सपनों में खोई रूपाली, लगती थी : ख़ुशियों की डाली!


लेकिन अब यह रूपाली हमेशा के लिए सपनों में खो गई है!

चुलबुल, दु:ख की इस घड़ी में हम सब तुम्हारे साथ हैं!

गुनगुन फिर से आएगी! एक नई रुनझुन के साथ!

फूलों की तरह फिर से मुस्कराएगी तुम्हारे साथ!


रावेंद्रकुमार रवि

सोमवार, अगस्त 02, 2010

कितने अच्छे : ममता भारती की शिशुकविता

कितने अच्छे


बेहद प्यारे-प्यारे लगते
हैं मुर्गी के बच्चे।
रंग दूधिया-सा है इनका,
दिखते कितने अच्छे।

मिलकर रहते संग सभी ये,
झगड़ा कभी न करते।
भूख लगे तो बहुत मज़े से,
दाना चुगने लगते।

सुबह-सुबह जल्दी उठ जाते,
जल में ख़ूब नहाते।
जब तक इनका बचपन रहता,
ये चूज़े कहलाते।


ममता भारती
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