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शुक्रवार, फ़रवरी 05, 2010

मानसिकता : संगीता स्वरूप की एक लघुकथा


मानसिकता

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संगीता स्वरूप

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"माँ ! मैं कक्षा में प्रथम आई हूँ !" -  बिटिया ख़ुशी से चिल्लाती हुई घर में घुसी । 

माँ ने कहा - "अव्वल आई है तो क्या ? पराये घर जाकर चूल्हा ही तो झोंकना है तुझे । इतना चिल्ला क्यों रही है ?" 

माँ की बात बेटी के दिल को लग गई । उसने ठान लिया कि वो चूल्हा तो नही झोंकेगी । 

वक्त गुज़रा । 

आज वो भारतीय प्रशासनिक सेवा में है । माँ गर्व से बताती है कि उसकी बेटी सरकारी अफसर है । 

एक दिन पड़ोसन ने पूछ लिया - "बेटी को घर का काम भी आता है ? खाना बना लेती है ?" 

माँ ने अकड़कर कहा -"मेरी बेटी बहुत बड़ी सरकारी अफसर है ! वो चूल्हा क्यों झोंकेगी ?" 

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9 टिप्‍पणियां:

shikha varshney ने कहा…

आपकी ये रचना बहुत कुछ कहती है..चंद पंक्तियों में आपने हमारे समाज की पूर्ण मानसिकता का समावेश कर दिया है...क्या कभी बदलेगी हमारी ये मानसिकता? बेहतरीन लघुकथा संगीता जी

rashmi ravija ने कहा…

वाह क्या बात है...बहुत ही सुन्दर लघु कथा....काश सब बेटियों में वही लगन जाग जाए..

Udan Tashtari ने कहा…

बढ़िया कथा...समाज में व्याप्त विसंगति ही है यह.

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

शिखा जी, मुझे विश्वास है -
"सबकी न सही,
पर कुछ लोगों की तो अवश्य बदलेगी -
ऐसी मानसिकता!"

यही कारण है -
"सरस पायस" पर इस लघुकथा के प्रकाशन का!

अनामिका की सदाये...... ने कहा…

itne kam shabdo me itni ehem baat keh dena such me ek apne aap me bahut bada hunar hai...jo apki kalam me dikhayi deta hai.

aur hamare samaj ki mansikta darshati ek sudrad rachna jis se sambhav hai koi samvedansheel man parivartit ho.

badhayi.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

समाज को आइना दिखाती इस लघुकथा के लिए
लेखिका संगीता स्वरूप जी को बधाई!
सरस पायस पर इसे प्रकाशित करने के लिए
रावेंद्रकुमार रवि जी का धन्यवाद!

रश्मि प्रभा... ने कहा…

badalti mansikta ki hi shuruaat hai yah kahani

निर्मला कपिला ने कहा…

गर देखा जाये तो हम लोग ही कहीं न कहीं लडकियों को आगे बढने से रोक लेते हैं हमारी नज़र मे केवल घर ही दिखता है लडकी के लिये। आपने इस कहानी के माध्यम से बहुत कुछ कह दिया । सुन्दर \ बधाई

डॉ टी एस दराल ने कहा…

प्रेरणात्मक लघु कथा।

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