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शनिवार, नवंबर 20, 2010

कलाबाजियाँ ख़ूब दिखाती : रावेंद्रकुमार रवि की बालकविता

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कलाबाजियाँ ख़ूब दिखाती
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मैंने पाली एक गिलहरी,
भोली-भाली, झबरी-झबरी!
चमकीली आँखें हैं जिसकी,
मूँछ-पूँछ हैं बहुत सुनहरी!


मेरे कमरे में वो दिन-भर
इधर-उधर है फुदका करती!
अनजाना कोई आए तो
झट मेरी गोदी में छुपती!


सुबह मुझे वो जल्द उठाती,
‘टिर्र-टिर्र’कर गीत सुनाती!
बिस्किट जब देता मैं उसको,
अपने नन्हे हाथ बढ़ाती!


जब भी वो ज़्यादा ख़ुश होती,
कलाबाजियाँ ख़ूब दिखाती!
मुझे रिझाने को वो अक्सर
‘चिक-चिक’ करके मुझे बुलाती!

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रावेंद्रकुमार रवि
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7 टिप्‍पणियां:

चैतन्य शर्मा ने कहा…

सुनहरी पूंछ वाली गिलहरी की प्यारी कविता.... बहुत सुंदर लगे फोटो....

मनोज कुमार ने कहा…

मेरे कमरे में वो दिन-भर
इधर-उधर है फुदका करती!
बहुत सुंदर प्रस्तुति।

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत प्यारी रचना.

डॉ. नागेश पांडेय "संजय" ने कहा…

गिलहरी पर आपने बहुत ही सुन्दर शैली में कविता रची है . आपका शब्द चयन तो लाजबाब रहता ही है . तारीफ़ करूँगा जमकर जिसने इसे ( कविता को ) बनाया .

शरद कोकास ने कहा…

बहुत प्यारी कविता है ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

कविता और गिलहरी दोनों ही मनभावन हैं!

सृजन पांडेय ने कहा…

बहुत रोचक और प्यारी सी कविता . चित्र भी आकर्षक .

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