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गुरुवार, नवंबर 18, 2010

चूहे ने बंदूक उठाई : प्रदीप सिंह की शिशुकविता

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चूहे ने बंदूक उठाई



चूहा ले आया बंदूक,
सोचा, अब ना होगी चूक। 

बिल्ली ना आएगी पास,
कर बैठा वो ऐसी आस। 

ज्यों ही बिल्ली पड़ी दिखाई,
 चूहे ने बंदूक उठाई। 

पर उसकी यह समझ न आए, 
गोली कैसे डाली जाए?

बिल्ली ने जब दाँत दिखाए,
भागा तब वह पूँछ दबाए।
My Photo

प्रदीप सिंह 
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3 टिप्‍पणियां:

चैतन्य शर्मा ने कहा…

बहुत ही मजेदार कविता..... फोटो भी बहुत ही प्यारी लगाई है... .

रानीविशाल ने कहा…

हा हा हा ...बहुत मज़ेदार
अनुष्का

डॉ. नागेश पांडेय "संजय" ने कहा…

प्रदीप की कविता पढ़कर दोहरी ख़ुशी हुई . पहली इसलिए कि कविता जबरदस्त है और दूसरी इसलिए कि वे मेरे विद्यार्थी भी रहे हैं . आप उनका फोटो न छापते तो शायद मैं नहीं जान पाता . ... रहिमन अति सुख होत है बढ़त देख निज गोत . मेरी शुभकामनायें .

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