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शुक्रवार, सितंबर 10, 2010

इतना मत दो : पूर्णिमा वर्मन की एक शिशुकविता

इतना मत दो


इतना मत दो बाबा,
खतम नहीं कर पाऊँ!
तुम डाँटो-झल्लाओ
मैं रोऊँ-घबराऊँ!

थोड़ा-थोड़ा परसो,
थोड़ा-थोड़ा खाऊँ!
मुझको भी तो डर है,
मोटी ना हो जाऊँ!


पूर्णिमा वर्मन (आन्या की नानी)

(चित्र में : आन्या)

6 टिप्‍पणियां:

विवेक सिंह ने कहा…

वाह ! बहुत बढ़िया !

AlbelaKhatri.com ने कहा…

sundar rachna !

निर्मला कपिला ने कहा…

सुन्दर बाल कविता। आभार।

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर लगी यह वाल कविता धन्यवाद

Chinmayee ने कहा…

बहुत सुन्दर

राजभाषा हिंदी ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

हिन्दी, भाषा के रूप में एक सामाजिक संस्था है, संस्कृति के रूप में सामाजिक प्रतीक और साहित्य के रूप में एक जातीय परंपरा है।

देसिल बयना – 3"जिसका काम उसी को साजे ! कोई और करे तो डंडा बाजे !!", राजभाषा हिन्दी पर करण समस्तीपुरी की प्रस्तुति, पधारें

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