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शनिवार, सितंबर 18, 2010

मैं न किसी से डरता हूँ : दीनदयाल शर्मा की शिशुकविता

(सौवीं पोस्ट)

मैं न किसी से डरता हूँ




चूहा बोला - "माँ जी, मैं तो,
आज पतंग उड़ाऊँगा!
डोर बहुत मज़बूत बाँधकर,
मैं भी पेंच लड़ाऊँगा!"


माँ जी बोलीं - "तुम बच्चे हो,
बात पेंच की करते हो!
मोटी बिल्ली घूम रही है,
क्या उससे ना डरते हो?"

"ऐसे-ऐसों को तो दिनभर,
ख़ूब छकाया करता हूँ,
चूहा बोला - "बिल्ली क्या है?
मैं न किसी से डरता हूँ।"



कविता : दीनदयाल शर्मा


चित्रसज्जा : डॉ.रूपचंद्र शास्त्री "मयंक"

12 टिप्‍पणियां:

रंजन ने कहा…

वाह..

संजय भास्कर ने कहा…

चूहा बोला - "बिल्ली क्या है?
मैं न किसी से डरता हूँ।

.........बहुत खूब, लाजबाब !

संजय भास्कर ने कहा…

बेहद ख़ूबसूरत और उम्दा

Saba Akbar ने कहा…

बहुत सुन्दर !

Coral ने कहा…

बहुत सुन्दर ....

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत अच्छी शिशु कविता

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

चित्र के साथ शर्मा जी की कविता बहुत मेल खा रही है!

AlbelaKhatri.com ने कहा…

जय हो !

bahut sundar aur maasoom kavita...

हेमंत कुमार ♠ Hemant Kumar ने कहा…

बहुत सुन्दर बाल गीत और आकर्षक प्रस्तुति---कवि एवम चित्रकार दोनों लोगों को हार्दिक बधाई।

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत बेहतरीन!!

निर्मला कपिला ने कहा…

दीन दयाल जी कविता बहुत अच्छी लगी। बधाई।

दीनदयाल शर्मा ने कहा…

रावेन्द्र रवि जी, डॉ.मयंक जी और सभी टिप्पणीदाताओं को तहे दिल से आभार...

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