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सोमवार, जुलाई 19, 2010

मस्ती करने को मन तरसे : गिरीश पंकज के चार शब्द-चित्र


मस्ती करने को मन तरसे


सरस रहे हैं खेत हमारे,
फसल लिखेगी नई कहानी।
ख़ुश हैं बहुत हमारी नानी,
अहा, अहा, अब बरसा पानी।


गरमी भागी, आई बारिश,
सबके मन को भाई बारिश।
देख नाचती इस दुनिया को,
फूलों-सी मुस्काई बारिश।


बाहर देखो पानी बरसे,
मस्ती करने को मन तरसे।
आओ, कुछ मिट्टी में खेलें,
निकल पड़ो सब अपने घर से।


बरसा पानी जब धरती पर,
समझो हुई हमारी मौज।
नाचे, गाए, धूम मचाए,
बारिश में हम सबकी फ़ौज।

--
गिरीश पंकज

6 टिप्‍पणियां:

मनोज कुमार ने कहा…

इसे पढ़ने के बाद लगा कि मैं एक सदाबहार उत्तेजना महसूस कर रहा हूं।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

वाह....बहुत सुन्दर ....लगा कि सच बारिश कि फुहारों में भीग गए

AlbelaKhatri.com ने कहा…

bahut khoob............

waah !
kya baat hai

राज भाटिय़ा ने कहा…

वाह जी हम भी ऎसे ही करते थे

बाल-दुनिया ने कहा…

खूबसूरत रचना ..बधाई .
********************
'बाल-दुनिया' हेतु बच्चों से जुडी रचनाएँ, चित्र और बच्चों के बारे में जानकारियां आमंत्रित हैं. आप इसे hindi.literature@yahoo.com पर भेज सकते हैं.

Udan Tashtari ने कहा…

अब लग गया कि बारिश आ गई झमाझम!! बहुत उम्दा रचना.

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